तुम्हें देखना है—
बस करीब से…
इतने करीब से
जैसे पहले किसी ने नहीं देखा हो।
तुम सदानीरा प्रवाह,
और मैं—जन्मों की प्यास
लिए भटकता हुआ।
डर लगता है
कहीं तुम्हें पूरा पी न जाऊँ।
मैं न जह्नु बनना चाहता हूँ,
न भगीरथ होने का कोई गुमान है।
बस देखना चाहता हूँ तुम्हें—
खिलखिलाते, बहते हुए,
वैसे ही
जैसे उत्तराखंड के पहाड़
अपने अंतः को चीरकर
निकलती धारा को
निहारते हैं।
मैं चाहता हूँ तुम बहती रहो,
तुमसे आबाद रहे चमन,
तुम्हारी धानी चुनर ओढ़
मुस्कुराती रहे यह धरती।
जीवन-पथ के ऊबड़–खाबड़ मोड़ों से
जब भी गुज़रो तुम,
तुम्हारी कलकल से
थकान को मिले सुकून।
मैं देखना चाहता हूँ तुम्हें
तुम्हारी पूर्णता में—
भावनाओं की बाढ़ संग
लाती रहो प्रेम की उपजाऊ मिट्टी।
मैं अंतिम साँस तक
कहता रहूँ तुम्हारी कहानियाँ,
सुनाता रहूँ प्रेम गीत—
और समय
अपनी बांसुरी बजाता रहे।
मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता,
फिर रोना नहीं चाहता।
बाँहें फैलाए
मैं करता रहूँगा इंतज़ार—
और जब
मेरे आँसुओं के सागर में
तुम अंततः मिलोगी,
तब चख लेना मेरा स्वाद।