किताब का हिसाब : पढें, कवयित्री पल्लवी शर्मा का “कोलतार के पैर”

कहते हैं कि कला के सभी रूपों में एक अलिखित साम्य है। किसी कवि की कल्पना के जिस रूप को कवि शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता उसे कोई चित्रकार चित्रित कर सकता है क्योंकि वह भाव शब्दों से परे होता है. ऐसा ही मूर्तिकारों के साथ है .अपनी कृतियों में जिस अभिव्यक्ति को मूर्तिकार व्यक्त कर सकता है प्रायः इस संसार में और कोई माध्यम नहीं है जो मनोभावों को इस रूप में व्यक्त कर सके !

Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: January 1, 2025 10:45 pm

‘कोलतार के पैर’ की कवयित्री पटना निवासी पल्लवी शर्मा अमेरिका के ‘कैलिफ़ोर्निया कॉलेज ऑफ द आर्ट्स’ में लंबे समय से प्राध्यापक हैं ! ज़ाहिर है इनकी कविताओं में भी एक चाक्षुष कला के विशेषज्ञ की छाप दिखती है.

128 पृष्ठ के इस कविता संग्रह में छोटी छोटी 80 कविताएं हैं .कविताएं किसी कलाकृति की झलक देती है . बहुत सारी चीजों पर आम लोगों की नज़र नहीं जाती है .किसी कवि की दृष्टि उस पर जाती है और उसका उपयोग अपने भाव को व्यक्त करने में करता है. किसी कलाकार की दृष्टि तो और भी पैनी होती है. पूर्णतः निरर्थक वस्तुओं ,व्यक्तियों में भी अर्थ ढूंढ कर उसे कलात्मक रूप देकर उसे मानवीय संवेदना को संवेदनशील करने की क्षमता किसी चित्रकार, मूर्तिकार में होती है. और अगर कोई कवि चित्रकार भी हो तो क्या कहने! सैकड़ों वर्षों से करोड़ों लोग ‘मोनालिसा’ के चित्र को सराहते नहीं थके.

अनगिनत विशेषज्ञ विद्वान अब भी उसकी हल्की मुस्कुराहट को समझने में व्यस्त हैं. पल्लवी एक चित्रकार -कवयित्री हैं. संग्रह के बीच बीच में उन्होंने कई पृष्ठों पर अलग से अपनी स्केच भी डाली है जो संग्रह को एक खासियत प्रदान करता है।

पल्लवी के कुछ कविताओं की पंक्तियां देखिये: “संदूक में बंद कर यादों को / चली आयी थी/ पसरे समुद्र को लांघ / स्वतंत्रता की कुलबुलाहट लिये/ नये देश में./ एंजेल आइलैंड के खारे पानी में/ खंगालकर अपने जख्मों को/ कैसे बसाई होगी नई दुनिया पुतली में.” (‘कला बगाई ‘ ,पृष्ठ संख्या-127) पल्लवी की कविताओं में ऐसे शब्द प्रयोग किये गए हैं जो बहुत सामान्य नहीं हैं.

इनकी भाषा प्रांजल है और कूची के अद्भुत रंगों की तरह शब्दों और भावों का विपुल भंडार भी है. एक अन्य कविता की पंक्तियों को देखिए : “आंखें पुकारती हैं खारे पानी को/ जो बह रहा है उस भूखंड के चारों ओर/ जहाँ अपने सपनों को संदूक में बंद कर /आये थे लोग हस्र बार छोड़कर /अपना नाम पता भूल कर/ एक नए नाम के साथ / ——————– टूटते परिवार को देख / देह को मानो काठ मार गया हो/बहते आँखों का धूमिल सपना/’अमेरिकन ड्रीम’बतियाता नहीं / लेकिन सब पता है/ एंजेल आइलैंड के खारे पानी को.” (‘अमेरिकन ड्रीम’,पृष्ठ संख्या:126)

उपरोक्त पंक्तियों की चित्रात्मकता गौर करने लायक है. दृश्य और मनोभाव दोनों आपके सामने उपस्थित हो जाता है. एक अन्य कविता की पंक्तियों पर दृष्टि डालिये : “मेरी चोटी से निकलेगी धार रेखाओं की/समेट लेगी मुझे पूरा का पूरा / एक बाल के गुच्छे सी/गिजबिजायेगी सफ़ेद काग़ज़ पर बदल कर अपना रूप/ खोजते खोजते/ खो जाएगी रोशनी की सतह पर./ ***********

स्याही में पसरे रौनक को/ बहा कर लायी हूँ मैं पहाड़ों से/रुआँसी हूँ पर रो नही रही /कैनवास पर बिखरा हुआ रंग ज़िंदा है/ इसे…. अभी मत छूना.” (‘छूना मत’,पृष्ठ: 9) पल्लवी की इन पंक्तियों में एक साथ कवि और चित्रकार का रूप दिख जाता है. पल्लवी की कविताएं अलग मिज़ाज़ ,अलग स्वाद की कविताएं हैं जो आपकी दृष्टि को,सोच को जैसे परिष्कृत करती है. संग्रह के कुछ कविताओं को विस्तार दिया जा सकता था. कई स्थान पर प्रूफ की त्रुटि भी दिखी. पर संग्रह पठनीय है और पुस्तक के रैक की शोभा बढ़ाने योग्य है.

कृति: कोलतार के पैर,

कवयित्री: पल्लवी शर्मा,

पृष्ठ-:128,मूल्य:रु 395 (हार्ड बाउंड)

प्रकाशक : अन्तिका प्रकाशन,शालीमार गार्डेन, गाज़ियाबा

 

 

 

 

 

 

 

 

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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3 thoughts on “किताब का हिसाब : पढें, कवयित्री पल्लवी शर्मा का “कोलतार के पैर”

  1. प्रमोद जी, अच्छी समीक्षा है! अंकित कवितायेँ अलग तेवर की हैं, आपको और पल्लवी दोनों को बधाई!

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