दिल्ली की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ चुका है। आम आदमी पार्टी (आप), जिसने कभी ‘आम आदमी’ के सपनों को अपना झंडा बनाया था, आज हार के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। 2015 और 2020 में जिस दिल्ली ने ‘आप’ को ऐतिहासिक बहुमत दिया था, उसी दिल्ली ने इस बार भाजपा को सत्ता सौंप दी। दिल्ली चुनाव 2025 में 70 में से 48 सीटें भाजपा के खाते में गईं, और ‘आप’ महज 22 सीटों पर सिमट गई।
यह सिर्फ एक हार नहीं है—यह एक पूरी राजनीतिक धारा के कमजोर पड़ने की गूंज है। इस हार में सत्ता विरोधी लहर तो थी, लेकिन यह केवल ‘10 साल पुरानी सरकार के खिलाफ नाराजगी’ का मामला नहीं था। यह सवाल अब बड़ा है—क्या यह केजरीवाल के राजनीतिक सफर के अंत की शुरुआत है?
भरोसे की नींव दरक गई?
दिल्ली की जनता ने ‘आप’ को एक आंदोलन के रूप में स्वीकार किया था। लेकिन जब आंदोलन सत्ता बन जाता है, तो जनता उससे कुछ ज्यादा ही उम्मीदें पाल लेती है। 2015 में जोश से भरे लोग बदलाव की आस में वोट डालने निकले थे। 2020 में शिक्षा और स्वास्थ्य के सुधारों पर जनता ने एक बार फिर भरोसा जताया। लेकिन 2025 में उन सपनों का क्या हुआ?
दिल्ली की बुनियादी समस्याएँ जस की तस रहीं—यमुना का पानी अब भी जहरीला है, जलभराव की समस्या हर बारिश में कहर बरपाती है, और अनधिकृत कॉलोनियों में जिंदगी वैसी ही संघर्षपूर्ण बनी हुई है। मुफ्त बिजली-पानी ने एक वक्त वोट खींचे, लेकिन जब दिल्ली की सड़कें टूटी हुई हैं, ट्रैफिक बेकाबू है, और रोजगार के अवसर सीमित हैं, तो जनता ‘फ्रीबीज’ से आगे सोचने लगती है।
केजरीवाल की ‘ईमानदारी‘ पर सबसे बड़ा सवाल
अरविंद केजरीवाल का पूरा राजनीतिक मॉडल एक चीज़ पर टिका था—”हम ईमानदार हैं, बाकी सब चोर हैं।” लेकिन जब खुद उन्हीं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे, तब उनकी सबसे बड़ी ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।
2024 में जब दिल्ली शराब नीति घोटाला सामने आया, तो ‘आप’ की छवि को सबसे बड़ा झटका लगा। जब मनीष सिसोदिया जेल गए, तब पार्टी पर संकट मंडराने लगा। लेकिन जब खुद केजरीवाल गिरफ्तार हुए, तो जनता के मन में सवाल उठने लगे—क्या ‘आप’ सच में बाकी पार्टियों से अलग है?
राजनीति में सिर्फ नारे काम नहीं करते, विश्वास का होना ज़रूरी है। और इस बार, जनता का भरोसा टूट गया।
भाजपा की रणनीतिक जीत—‘आप’ का कोई जवाब नहीं
भाजपा इस बार अलग ही रणनीति के साथ उतरी थी। उसने सिर्फ हिंदुत्व या मोदी लहर के भरोसे चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि ‘आप’ के मॉडल को ही जनता के सामने सवालों के घेरे में ला दिया।
‘आप’ के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं था।
कांग्रेस का ‘खामोश लेकिन असरदार’ हमला
इस बार कांग्रेस ने एक चतुर चाल चली। उसने न ज्यादा प्रचार किया, न ही कोई बड़ी रैलियाँ कीं। लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के अंतिम समय के हमलों ने ‘आप’ को नुकसान पहुँचा दिया।
अल्पसंख्यक वोट बैंक जो कभी ‘आप’ के पक्ष में था, वह कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गया। दलित वोटों में भी कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत की। नतीजा यह हुआ कि ‘आप’ की कई सीटों पर वोट कटने लगे, और भाजपा इसका सीधा फायदा उठाने में सफल रही।
‘केजरीवाल-केंद्रित’ पार्टी, जो अकेले लड़ाई नहीं जीत सकती
जब एक पार्टी किसी एक व्यक्ति के कंधों पर टिकी हो, तो संकट के समय वह लड़खड़ा जाती है। यही ‘आप’ के साथ हुआ।
इस दौरान, पार्टी के अंदर कोई दूसरा मजबूत चेहरा उभर ही नहीं पाया। दिल्ली की जनता को ‘केजरीवाल के बाद कौन?’ का जवाब नहीं मिला।
MCD की नाकामी—‘आप’ के खिलाफ सबसे बड़ा सबूत
2022 में जब ‘आप’ ने दिल्ली नगर निगम (MCD) जीता था, तब जनता को उम्मीद थी कि दिल्ली की सफाई और बुनियादी सुविधाओं में सुधार होगा। लेकिन हकीकत यह रही कि कूड़ा प्रबंधन से लेकर सड़क सुधार तक, MCD में भी ‘आप’ कोई जादू नहीं दिखा पाई।
जब लोगों ने देखा कि ‘आप’ के पास अब बहाने नहीं बचे हैं, तो उन्होंने अपना फैसला सुना दिया।
‘आप‘ की राजनीति ने क्या गलत किया?
‘आप’ की राजनीति पिछले कुछ सालों में केवल ‘मोदी-विरोध’ तक सीमित होकर रह गई थी। दिल्ली की जनता को विकास चाहिए था, लेकिन ‘आप’ ने अपना पूरा चुनावी अभियान भाजपा पर हमलों तक सीमित रखा।
जहाँ भाजपा ने बड़े विजन के साथ प्रचार किया, वहीं ‘आप’ केवल अपने बचाव में लगी रही।
अब आगे क्या? क्या ‘आप’ का अंत हो रहा है?
‘आप’ के सामने अब दो ही रास्ते हैं—
दिल्ली चुनाव 2025 सिर्फ एक हार नहीं थी। यह एक चेतावनी थी। यह संकेत था कि जनता अब सिर्फ मुफ्त सुविधाओं से संतुष्ट नहीं होगी। उसे एक मजबूत सरकार चाहिए, एक ईमानदार सरकार चाहिए, और सबसे अहम—एक ऐसी सरकार चाहिए, जो केवल दूसरों पर उंगली उठाने के बजाय खुद भी जवाबदेह बने।
अगर ‘आप’ ने इस संकेत को नहीं समझा, तो यह हार उसकी आखिरी बड़ी हार भी साबित हो सकती है।
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