देश का प्रत्येक जनजातीय बहुल क्षेत्र यूं ही मुख्य धारा से अलग थलग रहा है फिर उस क्षेत्र के जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों (योद्धाओं)को साम्राज्यवादी इतिहासकार क्यों स्थान देते ? उन्होंने भी ऐसे वीरों को अंग्रेज़ शासकों की भाषा में ही ‘अराजक’,’चोर’,’डाकू ‘ जैसा मानते रहे. आदिविद्रोही तिलका मांझी के लेखक घनश्याम जी पिछले चालीस से अधिक वर्षों से बर्तमान झारखंड के मधुपुर क्षेत्र में शोषितों,वंचितों को संगठित कर आवाज़ उठाते रहे हैं.
घनश्याम जी बेतहाशा जंगलों की कटाई, बेतरतीब खानों की खुदाई और नदियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए कार्यरत हैं . घनश्याम जी मानते हैं कि अपने लोगों को अपने क्षेत्र के इतिहास और इतिहास पुरुषों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए इससे लोगों के संघर्ष को बल मिलेगा .युवाओं को प्रेरणा और दिशा मिलेगी यह जानकर कि अंग्रेजों के साथ संघर्ष कर कैसे पूर्वजों ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है. इस दिशा में ही सोचते हुए घनश्याम जी ने सरल हिंदी भाषा में “हुलगुलान के शहीद श्रृंखला ” में सभी अनजान स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में लिखने की ठानी .इसकी श्रृंखला की पहली पुस्तक है “आदिविद्रोही तिलका मांझी.
घनश्याम जी के इस पुस्तक की विशेषता है ऐतिहासिक तथ्यों के साथ साथ लोकगीतों, लोककथाओं और किंवदंतियों में उपलब्ध साक्ष्यों पर भी विचार कर सम्मिलित करना ! घनश्याम जी ने तिलका मांझी पर ही पहली पुस्तक लिखी है. योजना है कि एक एक कर सभी योद्धाओं पर पुस्तक लिखी जाएगी . डॉ. रविशंकर सिंह जी ने भूमिका में विस्तार से तिलका मांझी के बारे में और पुस्तक लेखन की प्रक्रिया के बारे में बताया है.98 पृष्ठ की यह पुस्तक युवाओं और महिलाओं को विशेष कर पसन्द आएगी. पुस्तक की भाषा बहुत सरल है एवं देशज शब्दों का भी प्रयोग किया गया है जिससे स्थानीय पाठक सरलता से आत्मसात कर सकेंगे ! पुस्तक संग्रहणीय और पठनीय है.
पृष्ठ:98, प्रकाशक :वाणी प्रकाशन मूल्य: रु299

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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