जैसे नींद में सपना वास्तविक लगता है, वैसे ही मन की कल्पनाएँ संसार को वास्तविक बनाती हैं।
जब मन शांत होता है, तब संसार दुख का कारण नहीं रहता।
राम का प्रश्न — “मुझे सब व्यर्थ क्यों लग रहा है?”
युवा अवस्था में राम एक तीव्र विरक्ति से घिर जाते हैं।
उन्हें राज, धन, ऐश्वर्य— सब क्षणभंगुर लगने लगता है।
वे कहते हैं— “गुरुदेव! यह संसार क्षणभंगुर है। सुख-दुख आते-जाते हैं। इसका अर्थ क्या है?”
राम का यही प्रश्न पूरा योगवशिष्ठ का आधार है।
वशिष्ठ अध्यात्म को चार मुख्य स्तंभों में समझाते हैं—
1. विवेक — सत्य और असत्य को पहचानने की कला।
2. संसार परिवर्तनशील है, इसलिए यह स्थायी सुख नहीं दे सकता।
स्थायी वह है जो अपरिवर्तनशील है — अर्थात आत्मा।
3. वैराग्य — अनासक्ति की सहज भावना
वैराग्य का अर्थ भागना नहीं, बल्कि यह समझना है कि ‘सब कुछ मेरा होकर भी कुछ मेरा नहीं।’
उदाहरण:
राम ने राज्य, लक्ष्मी, वैभव आदि सबका मूल्य जाना,
लेकिन कर्तव्य से विमुख नहीं हुए। यही सच्चा वैराग्य है।
वशिष्ठ सिखाते हैं—
“मन संयमित हो तो संसार स्वर्ग है।
मन असंयमित हो तो स्वर्ग भी नर्क बन जाता है।”
4.वशिष्ठ आत्म विचार को अध्यात्म की शीर्ष साधना बताते हैं—
“कोऽहम् ? — मैं कौन हूँ?”
जब साधक यह देख लेता है कि “मैं न शरीर हूँ, न मन — मैं अनंत चेतना हूँ,”
तभी अध्यात्म पूर्ण होता है।
वशिष्ठ से ज्ञान पाने के बाद राम कहते हैं—
“धर्म वह है जो मन को शुद्ध करे,
और कर्म वह जो लोकहित में हो।”
राम का अध्यात्म है—सरलता, सेवा, करुणा, मर्यादा, सत्य
वे कहते हैं:
“आत्मसंतोष ही परम सुख है।”राम का जीवन दिखाता है कि ज्ञान और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं।
राम और वशिष्ठ का संयुक्त संदेश -मन को जानो — वही बन्धन हैआत्मा को पहचानों — वही मुक्ति है. संसार मत छोड़ो — मोह छोड़ो. कर्म करो — पर फल की आसक्ति मत रखो.
सत्य में स्थिर रहो — भय स्वयं मिट जाएगा राम कहे गुरुदेव से, इस जग में सुख कौन।
वशिष्ठ कहे—मन जीत ले, फिर दुख रहे न कोन।।
वशिष्ठ का सार:
बाहर जग को मत डँढो, भीतर ज्योति जलाय।
मन निर्मल हो जाय जब, सत्य स्वयं मुस्काय।।
अध्यात्म न जंगल में है, न पहाड़ों में —
वह है अपने मन को समझने,
सत्य को पहचानने,
और मर्यादा से जीने में।
आध्यात्मिक ज्ञान किसी से सीखा नहीं जाता बल्कि इसे जिया जाता है। जैसे दीपक से दीपक जगता है, वैसे ही साधना से भीतर छिपा प्रकाश जाग उठता है। जब मन शांत होता है, तब ज्ञान का द्वार खुलता है।
ध्यान मन को एक दर्पण की तरह स्वच्छ करता है।
“मन निर्मल हो जाय जब, दिखे सत्य का रूप।
जल जैसा शांत हो मन, मिटे कलुष, मिटे धूप।।
आत्म-चिंतन से आध्यात्मिक विकास होता है इसलिए अपने विचार, देखना ही आध्यात्मिकता का आरंभ है।
कबीर कहते हैं—
“तू तील-तील में राम को, क्यों ढूँढे रे मूढ़?
अपने भीतर झाँक ले, जग से क्या है दूढ़?”
गीता, उपनिषद, बाइबल, धम्मपद — ये दिशा बताते हैं; चलना स्वयं को पड़ता है।
दोहा (कबीर):
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
अर्थ: जब तक प्रेम, करुणा, सत्य का अनुभव नहीं, तब तक शास्त्र केवल शब्द हैं।
संत–महापुरुषों के जीवन में वह सरलता है, जो उपदेशों से भी अधिक प्रभाव हम पर छोड़ती है।
उदाहरण:
स्वामी विवेकानंद ने कहा—
“एकात्मता का अनुभव कर लो, फिर पूरी दुनिया तुम्हारी हो जाएगी।आसक्ति मन को नीचे खींचती है। वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि अपेक्षाएँ छोड़ना है।
उदाहरण:
राजा जनक — राजमहल में रहते हुए भी पूर्ण ज्ञानी हो गए।
क्योंकि उनका मन महल में नहीं, सत्य में स्थित था।
दोहा:
जोगी वह जो मन जोगे, देह नगर में जाय।
भीतर जिसका दीप जलै, वही ज्ञान को पाय।।
संत कहते हैं—
“संगति साधु की कीजिए, मिलै अमर फल होय।” जिस वातावरण में प्रेम, करुणा और सत्य हो, वहाँ मन स्वयं ऊपर उठता है। दूसरों का दुःख हल्का करते-करते मन स्वतः निर्मल हो जाता है।
उदाहरण: महात्मा गांधी कहते थे— “जब भी कोई निर्णय कठिन लगे, तो सोचो— इससे सबसे गरीब आदमी को क्या लाभ होगा?”
जिज्ञासा और आत्म-मनन: एक बच्चा जैसे हर चीज़ को देखकर सीखता है,
वैसे ही साधक हर क्षण को देखकर ज्ञान प्राप्त करता है।
दोहा:
जिन्ह खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डर्यो, रहा किनारे बैठ।। — कबीर
जो मिला है, उसके लिए ‘धन्यवाद’ कहने से मन तुरन्त शांत और शुद्ध होता है।

[मृदुला दुबे योग शिक्षक और अध्यात्म की जानकार हैं.]
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