उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष और प्रख्यात चिंतक, विद्वान पद्म भूषण रामबहादुर राय ने की। इस पर पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, अति विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव श्याम परांडे, स्वागताध्यक्ष, जापान के वरिष्ठ भाषाविद् पद्म श्री तोमियो मिज़ोकामि विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस अवसर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी भी उपस्थित थे। मंच संचालन अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन के निदेशक अनिल जोशी ने किया।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में विशिष्ट विद्वानों एवं शिक्षाविदों की गरिमामयी सहभागिता रही। इस सम्मेलन में देश के विभिन्न प्रांतों के अतिरिक्त 25 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। इस अवसर पर डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने एक चित्र प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया।
मुख्य अतिथि के रूप उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा, भाषाएं सभ्यता की जीवित चेतना हैं, क्योंकि ये केवल संवाद का साधन नहीं हैं, बल्कि स्मृति, संस्कृति, परम्परा और पीढ़ियों से हस्तांतरित मूल्यों की वाहक भी हैं। भारत की एकता कभी एकरूपता पर आधारित नहीं रही है; इसकी बजाय, यह कई भाषाओं के बीच आपसी सम्मान पर कायम रही है, जो साझा सभ्यतागत दृष्टिकोण और धर्म से जुड़ी हुई हैं। भारतीय भाषाएं एक दूसरे की विरोधी नहीं हैं; बल्कि ये एक-दूसरे की पूरक हैं और इस प्रकार वे दर्शन, ज्ञान और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को समृद्ध करती हैं।
उन्होंने कहा कि प्राचीन शिलालेखों और ताड़पत्रों से लेकर आधुनिक डिजिटल रूपों तक, भाषाओं ने मानव विचारों को आकार दिया, ज्ञान को संरक्षित किया और सामूहिक कल्पना को पोषित किया है। आज हमारी जिम्मेदारी केवल भाषाई विविधता की रक्षा करना ही नहीं है, बल्कि लुप्त होती भाषाओं का समर्थन करना और उन्हें शिक्षा और तकनीक के माध्यम से आत्मविश्वास के साथ ले आगे जाना भी है। इस प्रकार, प्रत्येक भाषा का सम्मान करते हुए हम प्रत्येक भारतीय की गरिमा को संरक्षित करते हैं, क्योंकि भारत एक है और हमेशा एक रहेगा।
डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कहा कि भारतीय भाषाएं केवल संवाद का साधन नहीं हैं, बल्कि वे संस्कृति, ज्ञान, दर्शन और सामाजिक मूल्यों की वाहक हैं। उन्होंने यह भी बताया कि हमारी भाषाओं ने मानव चेतना और परम्पराओं को संजोकर पूरी दुनिया में भारत की सभ्यता और ज्ञान का प्रचार किया है। उन्होंने कहा कि योग, आयुर्वेद, साहित्य और दर्शन जैसी अमूल्य धरोहरें हमारी भाषाओं के माध्यम से विश्व में फैल रही हैं।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारतीय भाषाएं संघर्ष नहीं सिखातीं, बल्कि सह-अस्तित्व, समता और सामंजस्य की शिक्षा देती हैं। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और व्यक्तित्व के विकास की आधारशिला भी हैं। डॉ. निशंक ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाएं विभाजन नहीं, बल्कि समरसता और ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करती हैं और यही उनकी शक्ति और गौरव है।
अध्यक्षीय सम्बोधन में श्री रामबहादुर राय ने कहा, यह सम्मेलन ऐसा अवसर है, जब हम भाषाओं पर अपना विचार बनाएं और उस पर काम करें। उन्होंने कहा कि कुछ भ्रमित साहित्यकारों और भाषाविदों ने ये बात फैलाई कि भारतीय भाषाएं चार परिवारों में बंटा हुई हैं। लेकिन आज ये साबित हो गया है कि सभी भारतीय भाषाएं एक परिवार की हैं। जब हम मान लेते हैं कि सभी भारतीय भाषाएं एक परिवार की हैं, तो यह कृत्रिम विभाजन टूट जाता है। हम कोशिश करें कि भारतीय भाषाओं में संवाद बढ़े। जब संवाद बढ़ेगा, तो एक तरंग पैदा होगी। भाषाओं की तरंग पैदा होगी, भाषाई एकता की तरंग पैदा होगी और सांस्कृतिक एकता की तरंग पैदा होगी। तरंग ही वो भावना होगी, जो भाषाओं को जोड़ेगी और भाषाभाषियों को भी जोड़ेगी।
विशिष्ट अतिथि पद्म श्री तोमियो मिज़ोकामि ने हिन्दी में बोलते हुए कहा, लोग कहते हैं कि मैं भारतीय हूं, जो गलती से जापान में पैदा हो गया।
तीन दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश से विद्वान, लेखक, भाषाविद्, शोधकर्ता एवं शिक्षाविद् भारतीय भाषाओं की वर्तमान चुनौतियों, तकनीक के साथ भाषा के संबंध, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की भूमिका तथा भाषाई विविधता के संरक्षण जैसे विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे। सम्मेलन का आयोजन अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वैश्विक हिंदी परिवार, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार तथा भारतीय भाषा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।
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