अपनी मातृभाषा के साथ साथ वंदना टेटे झारखंड की प्रायः सभी भाषाओं पर काम करती रही हैं. उनकी कविता की गहराई और गंभीरता ने पूरे देश के साहित्य जगत का ध्यान आकृष्ट किया है और उन्हें सभी सम्मानित मंचों से आमंत्रण मिलने लगा है. जनजातीय भाषाओं के लेखकों और कवियों को प्रकाशन में बहुत तरह की कठिनाइयाँ आती थीं.
वंदना टेटे जी ने एक जनजातीय चिंतक ,विद्वान के नाम से एक फाउंडेशन की स्थापना की “प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन”.यहाँ से इन्होंने दर्जनों जनजातीय लेखकों और कवियों की पुस्तकें प्रकाशित की हैं . वंदना हिंदी और खड़िया में लेखन, आदिवासी दर्शन और साहित्य की प्रस्तावक, अगुआ पैरोकार और प्रकाशक रही हैं. वंदना कई पत्र पत्रिकाओं की संपादक रही हैं.
इनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तक प्रकाशित हैं जिनमें प्रमुख हैं: 1.पुरखा लड़ाके(संपादन) 2.किसका राज है 3.झारखंड:एक अंतहीन समरगाथा(सहलेखन) 4.पुरखा झारखंडी साहित्यकार और नए साक्षात्कार(सं) 5.असुर सिरिंग(सं) 6.आदिम राग(सं)इत्यादि. प्रस्तुत संकलन दर्जनों पत्र पत्रिकाओं में छपी वंदना की कविताओं का एक जगह संग्रहण है. वंदना की बहुत सारी कविताएं बहुत जगह बिखरी पड़ी हैं पर यहाँ एक जगह उनके पाठकों को पढ़ने का अवसर मिलेगा. वंदना की कविताएं झारखंड के जनजीवन, संघर्ष और व्यथा का एक चित्र-कोलाज की तरह है.
इन कविताओं को पढ़ते हुए आपके सामने सारे चित्र उभरने लगते हैं और आप महसूसने लगते हैं. संग्रह की एक कविता है “जामुनी चेहरा”.देखिये इसकी पंक्तियों को : तुम्हारा चेहरा/ जामुन हो गया है सोनी/इसकी मिठास अब और बढ़ गयी है/इसका अर्क/असाध्य रोगों की अचूक दवा है/नहीं जानते वे/जिन्होंने बना दिया है तुमको जामुन. तुम मत सोचना सोनी/चेहरा खराब हो गया है तुम्हारा/उस समाज की बेटी हो तुम/जिसमें कोई चेहरा बदसूरत नहीं होता ….”
एक और कविता की पंक्तियों को देखिये: “कोनजोगा” (कामडारा प्रखंड स्थित खड़िया सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा एक पहाड़) “हम नहीं लड़ रहे / अपने लिए/कोनजोगा को/तोड़ रहे हैं लोग/कोनजोगा टूट रहा है/बगल की टोंगरी की तरह/नेस्तनाबूत कर देंगे वह/फिर भी/हम नहीं लड़ रहे /अपने लिए. पुरखा कथाओं में दर्ज़ / कोनजोगा टूट रहा है/पुरखा कथाओं में दर्ज/जतरा के1 ढोल की आवाज़/दफन हो रही है. छेनी और हथौड़े की आवाज़ में / पाना, मारतुल और घन/ठोक रहे हैं/ सीने पर कोनजोगा के /सरकारी नुमाइंदे/ठेकेदार और मुंशी/हम चुप हैं/हम नहीं लड़ रहे/ अपने लिये. हम क्यों चुप हैं?/हम क्यों नहीं लड़ रहे?
संग्रह की सभी49 कविताएं इसी तेवर की कविताएं हैं. कविताओं में स्थानीय शब्दों का समावेश किया गया है जिससे हिंदी भाषा और भी समृद्ध होगी. संग्रह अति पठनीय और संग्रहणीय है.
संग्रह: वंदना टेटे प्रतिनिधि कविताएं, कवयित्री: वंदना टेटे,
पृष्ठ : 88 , प्रकाशक: प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची. मूल्य: रु.169.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
स्थापित कवयित्री की कविताओं को पढ़ने का अवसर पत्रिकाओं में मिलता है। इनकी नई पुस्तक की समीक्षा और प्रमोद झा सर की लेखनी से बहुत कुछ जानने का अवसर मिला। आप दोनों को बहुत बधाई!
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