प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मौजूदगी में घोषित इस करार से दुनिया की लगभग दो अरब आबादी और वैश्विक GDP के करीब एक-चौथाई हिस्से को जोड़ने वाला विशाल आर्थिक गलियारा तैयार होगा। इसे मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है।
भारत को क्या मिलेगा
इस समझौते से भारत के टेक्सटाइल, चमड़ा, रत्न-आभूषण, इंजीनियरिंग उत्पाद, दवाइयाँ, ऑटो-कंपोनेंट्स और आईटी सेवाओं को यूरोपीय बाजार में व्यापक और आसान पहुँच मिलेगी। भारतीय निर्यातकों को EU में लगने वाले भारी शुल्क से राहत मिलेगी, जिससे भारत का निर्यात आने वाले वर्षों में तेज़ी से बढ़ने की संभावना है।
इसके साथ ही, सेवाओं और निवेश से जुड़े प्रावधानों से आईटी, स्टार्ट-अप्स और कुशल पेशेवरों के लिए नए अवसर खुलेंगे। कस्टम प्रक्रियाओं के सरलीकरण से व्यापार की लागत और समय दोनों में कमी आएगी।
यूरोपीय यूनियन के लिए फायदे
EU देशों को दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते बड़े बाज़ार भारत में ऑटोमोबाइल, मशीनरी, केमिकल्स, फार्मा और हाई-टेक उत्पादों के निर्यात का बड़ा मौका मिलेगा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, समझौते के तहत EU के करीब 96 प्रतिशत उत्पादों पर टैरिफ में कटौती होगी, जिससे यूरोपीय कंपनियों को हर साल अरबों यूरो की बचत हो सकती है।
वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पादों पर शुल्क में चरणबद्ध कमी से यूरोपीय उद्योगों को भी राहत मिलेगी।
संरक्षण और संतुलन
समझौते में भारत की संवेदनशील जरूरतों का भी ध्यान रखा गया है। कृषि, डेयरी और कुछ छोटे उद्योगों को पूर्ण मुक्त व्यापार के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि घरेलू किसानों और लघु उत्पादकों पर नकारात्मक असर न पड़े।
वैश्विक रणनीतिक संदेश
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक, यह करार केवल व्यापारिक नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी का भी प्रतीक है। अमेरिका-चीन व्यापार तनाव और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बदलाव के दौर में भारत-EU की यह नजदीकी वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिरता का संदेश देती है।
क्यों ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’
विशेषज्ञों के अनुसार, व्यापार, निवेश, सेवाएँ, डिजिटल नियम, टैरिफ कटौती और रणनीतिक सहयोग—सभी को एक साथ समेटने के कारण यह समझौता भारत के अब तक के सबसे व्यापक और महत्वाकांक्षी अंतरराष्ट्रीय करारों में गिना जा रहा है। यही वजह है कि इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है।
संक्षेप में, यह समझौता भारत को वैश्विक विनिर्माण और सेवा केंद्र के रूप में मजबूत करेगा, वहीं यूरोपीय यूनियन को एशिया में भरोसेमंद और दीर्घकालिक आर्थिक साझेदार देगा—एक ऐसा करार, जो आने वाले दशकों की आर्थिक दिशा तय कर सकता है।
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