मुख्य वक्ता के रूप में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने काशी को केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा बताते हुए कहा कि यह ग्रंथ काशी के बहुआयामी स्वरूप—धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक—को गहराई से प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि ऐसे ग्रंथ समकालीन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उपसभापति हरिवंश ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि इस संस्था की परम्परा अत्यंत गौरवशाली रही है। यह उन विरल संस्थानों में से है, जिसने भाषा और साहित्य के माध्यम से समाज और देश को दिशा दी तथा भारतीय चेतना को स्वर, भाषा और ऊर्जा प्रदान की। उन्होंने कहा, बनारस, काशी या वाराणसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि धर्म, विद्या, कला, संगीत और मानवीय सहअस्तित्व की भूमि है। काशी पर अब तक जितनी भी पुस्तकें लिखी गई हैं, यह पुस्तक उन सबसे भिन्न है, क्योंकि यह काशी को केवल विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभूति के रूप में प्रस्तुत करती है। इसकी गलियां, घाट, स्मृतियां और बौद्धिक परंपराएं हमारी अमूल्य धरोहर हैं।
उन्होंने कहा, मैं मानता हूँ कि तकनीक कितनी भी सशक्त हो जाए, वह पुस्तक का स्थान नहीं ले सकती। परम्परा को नए संदर्भों में आगे बढ़ाना ही बौद्धिक कर्म है। यह पुस्तक औचित्य, भाव, भाषा और दर्शन, हर स्तर पर पाठक को समृद्ध करती है। मुझे विश्वास है कि ऐसे प्रयास हिन्दी के बौद्धिक संसार को और अधिक सशक्त एवं समृद्ध करेंगे।
विशेष वक्तव्य में आईजीएनसीए के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी ने पुस्तक की विषयवस्तु और शोधपरक दृष्टि की सराहना करते हुए कहा कि ‘काशीस्थ’ काशी की परम्परा को समग्रता में समझने का एक सशक्त प्रयास है, जो अकादमिक जगत के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने कहा, काशी आपको पकड़ कर रखती है, उसमें गज़ब़ का सम्मोहन है। काशी को बहुत सारी उपमाएं दी गई हैं, लेकिन यह एक शहर नहीं, बल्कि संज्ञा है। यह एक जगह नहीं, कई जगह विद्यमान है। काशीमय हो जाना अपने आप में एक बड़ी संज्ञा है, एक बड़ा विशेषण है। काशी में एक तेज है और हमेशा रहेगा। पुस्तक के विभिन्न खंडों की विशेषताओं में बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे लेखों को ढूंढ़ कर सबके सामने लाना बहुत कठिन काम है, बहुत लगन का परिणाम है।
आधार वक्तव्य में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीसीआर) के सदस्य सचिव प्रो. धनंजय सिंह ने काशी को भारतीय ज्ञान-परंपरा का जीवंत केंद्र बताते हुए कहा कि ‘काशीस्थ’ जैसी कृतियां हमारी सांस्कृतिक स्मृति को सुदृढ़ करती हैं और परंपरा व आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करती हैं। उन्होंने कहा, यह पुस्तक सिर्फ एक शहर का नहीं, सभ्यता का इतिहास है। काशी की जो प्रवृत्ति है, वह हमें सकारात्मक वृत्ति प्रदान करती है।
व्योमेश शुक्ल ने अतिथियों का स्वागत करने के बाद, पुस्तक ‘काशीस्थ’ के माध्यम से काशी की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत निरंतरता को रेखांकित करते हुए इसके महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ‘काशीस्थ’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अप्रकाशित लेख सहित 13 विद्वानों के 17 लेखों को संकलित किया गया है। यह पुस्तक काशी के अध्यात्म, चिंतन, भूगोल और परम्परा की पड़ताल करती है।
कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन आईजीएनसीए के नदी उत्सव के संयोजक अभय मिश्र ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में विद्वान, शोधार्थी, लेखक, विद्यार्थी एवं संस्कृति-प्रेमी उपस्थित रहे।
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