समझौते के तहत ईरान को करीब 24 अरब डॉलर की फ्रीज्ड की हुई विदेशी संपत्तियां वापस मिलेंगी, जबकि युद्ध में तबाह हुए बुनियादी ढांचे, ऊर्जा प्रतिष्ठानों, बंदरगाहों और औद्योगिक परिसंपत्तियों के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका 300 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता और निवेश पैकेज उपलब्ध कराएगा। इस प्रकार कुल मिलाकर लगभग 324 अरब डॉलर का आर्थिक लाभ ईरान को मिलने जा रहा है। यही वजह है कि समझौते को लेकर सबसे अधिक चर्चा इसी बात की हो रही है कि युद्ध के बाद वास्तविक लाभ किसे मिला।
युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ईरान पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, तेल निर्यात पर दबाव बनाया था और फारस की खाड़ी में सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी थीं। दूसरी ओर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बनाकर वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार को प्रभावित किया। 110 दिनों तक चले इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितता पैदा कर दी थी।
नई डील के तहत दोनों देशों ने तत्काल युद्धविराम पर सहमति जताई है। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के लिए पूरी तरह खोलने, क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों को सीमित करने तथा परमाणु कार्यक्रम को लेकर नई वार्ता शुरू करने का फैसला किया गया है। समझौते में यह भी प्रावधान किया गया है कि ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को मान्यता दी जाएगी, जबकि परमाणु हथियारों के विकास को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था लागू रहेगी।
समझौते के बाद तेहरान में इसे राष्ट्रीय विजय के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ईरानी मीडिया का दावा है कि युद्ध शुरू होने के समय अमेरिका का उद्देश्य ईरान को आर्थिक और रणनीतिक रूप से झुकाना था, लेकिन अंततः उसे न केवल युद्ध रोकना पड़ा बल्कि प्रतिबंधों में राहत, जमी हुई संपत्तियों की वापसी और पुनर्निर्माण के लिए भारी आर्थिक सहायता देने पर भी सहमत होना पड़ा। ईरान समर्थक विश्लेषकों का कहना है कि यह परिणाम तेहरान की अपेक्षा से कहीं अधिक अनुकूल है।
दूसरी ओर अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इस समझौते ने एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध को टाल दिया है और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी। वाशिंगटन का दावा है कि समझौते के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी सुनिश्चित की गई है तथा मध्य-पूर्व में स्थिरता की नई शुरुआत हुई है।
हालांकि इस डील की सबसे तीखी आलोचना इजरायल और अमेरिका के कुछ रणनीतिक हलकों से सामने आ रही है। उनका मानना है कि समझौते में ईरान को अत्यधिक रियायतें दी गई हैं और इससे क्षेत्र में उसका प्रभाव और बढ़ सकता है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समझौते की आर्थिक शर्तों को देखा जाए तो युद्ध के बाद ईरान पहले से अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई देता है।
यही कारण है कि 110 दिनों के इस संघर्ष का अंत केवल युद्धविराम के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे मध्य-पूर्व की नई भू-राजनीतिक व्यवस्था की शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि 324 अरब डॉलर के इस विशाल पैकेज और राजनीतिक समझौते ने वास्तव में क्षेत्र में स्थायी शांति की नींव रखी है या यह भविष्य के नए शक्ति-संतुलन की प्रस्तावना भर है।
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