ईरान की शीर्ष संयुक्त सैन्य कमान ख़ातम अल-अनबिया के हवाले से सरकारी-समर्थित मीडिया ने कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट पर रोक “पहला कदम” है और यदि “आक्रामकता” जारी रही तो आगे और कदम उठाए जा सकते हैं। ईरान का आरोप है कि समझौते की भावना के विपरीत लेबनान मोर्चे पर इज़राइली कार्रवाई जारी रही, जबकि समझौते का उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव कम करना था। दूसरी ओर अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि हॉर्मुज पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, समुद्री यातायात पर नजर रखी जा रही है और स्थिति ईरान की घोषणा जितनी निर्णायक नहीं है। यही विरोधाभास इस पूरे संकट को और पेचीदा बना रहा है।
दरअसल, हाल में बने मसौदा समझौते की सबसे अहम शर्तों में यह शामिल था कि ईरान हॉर्मुज को वाणिज्यिक जहाजों के लिए खोलेगा, जबकि बदले में अमेरिका ईरान पर नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा, तेल निर्यात पर सीमित राहत देगा और आगे व्यापक परमाणु समझौते की दिशा में वार्ता बढ़ेगी। इसी उम्मीद में वैश्विक तेल बाजार ने राहत की सांस ली थी। लेकिन अब वही हॉर्मुज, जो समझौते की बुनियादी शर्त था, फिर विवाद के केंद्र में आ गया है।
इस संकट की जड़ केवल अमेरिका-ईरान अविश्वास में नहीं, बल्कि लेबनान-इज़राइल मोर्चे में भी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने संकेत दिया है कि यदि लेबनान में हमले जारी रहते हैं तो स्विट्ज़रलैंड में प्रस्तावित अमेरिका-ईरान वार्ता से ठोस नतीजे निकलना मुश्किल होगा। सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों के प्रतिनिधि वार्ता की तैयारी में हैं, लेकिन ताज़ा तनाव ने उसकी सफलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
हालांकि हॉर्मुज की जमीनी स्थिति को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। शनिवार को तीन भारतीय ध्वज वाले तेल टैंकर सुरक्षित रूप से हॉर्मुज स्ट्रेट पार कर गए, जिससे संकेत मिला कि समुद्री यातायात पूरी तरह ठप नहीं हुआ है। फिर भी सबसे बड़ा सवाल यह है कि जहाजरानी कंपनियां, बीमा एजेंसियां और तेल व्यापारी इस मार्ग को कितना सुरक्षित मानते हैं। यदि जोखिम बढ़ा और आवाजाही प्रभावित हुई, तो समझौता कागज पर बचा रहने के बावजूद उसका सबसे बड़ा आर्थिक उद्देश्य—ऊर्जा आपूर्ति की सामान्य बहाली—कमजोर पड़ जाएगा। कुल मिलाकर, हॉर्मुज पर नई रोक ने अमेरिका-ईरान समझौते को सीधे संकट में डाल दिया है।
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