भारतीय रेलवे की यह 10-कोच वाली ट्रेन जींद–सोनीपत के 89 किलोमीटर लंबे रेलखंड पर चलेगी। इसमें दो हाइड्रोजन पावर कार और आठ यात्री कोच हैं तथा लगभग 2,600 यात्रियों के सफर की क्षमता है। इसकी अधिकतम परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है। ट्रेन पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित की गई है और इसके लिए जींद में हाइड्रोजन उत्पादन तथा रीफ्यूलिंग की व्यवस्था भी स्थापित की गई है। परियोजना पर लगभग 210 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है।
हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें डीजल इंजन की जगह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न होती है। इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन नहीं होता और उप-उत्पाद के रूप में केवल जलवाष्प निकलती है। यही कारण है कि इसे शून्य-उत्सर्जन (ज़ीरो एमिशन) परिवहन तकनीक माना जाता है।
रेलवे ने सुरक्षा के लिए ट्रेन में हाइड्रोजन रिसाव का पता लगाने वाले सेंसर, अग्निशमन प्रणाली, तापमान और धुएं की निगरानी करने वाले उपकरण तथा बहुस्तरीय सुरक्षा तंत्र लगाए हैं। यह परियोजना राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
दुनिया में व्यावसायिक स्तर पर हाइड्रोजन ट्रेन संचालन की शुरुआत सबसे पहले जर्मनी ने सितंबर 2018 में की थी। इसके बाद जापान ने 2022 में परीक्षण आधारित यात्री सेवा शुरू की। चीन ने भी हाइड्रोजन रेल तकनीक का विकास किया है, जबकि अमेरिका में सितंबर 2025 से कैलिफोर्निया में हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शुरू हुआ। भारत अब इस सूची में शामिल होने वाला नवीनतम देश बन गया है।
रेल विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में 99 प्रतिशत से अधिक ब्रॉडगेज नेटवर्क का विद्युतीकरण हो चुका है, इसलिए हाइड्रोजन ट्रेनों का उपयोग मुख्य रूप से उन रेलखंडों पर अधिक उपयोगी होगा, जहां ओवरहेड विद्युतीकरण व्यावहारिक या किफायती नहीं है। इसके साथ ही यह परियोजना रेलवे से आगे बढ़कर देश में हरित हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था विकसित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।
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