36 हजार किमी ऊपर भारत की नई ‘आंख’, मौसम से सीमा तक बदलेगी निगरानी की तस्वीर

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के GSLV-F17 ने सफलतापूर्वक EOS-05 को कक्षा में पहुंचा दिया है। 2021 की नाकामी के पांच साल बाद यह बड़ी कामयाबी मिली है। भारत ने अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लगातार नजर रखने की tv अपनी क्षमता को एक नई ऊंचाई दी है। करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई से पृथ्वी की निगरानी करने वाला यह उपग्रह भारत के लिए महज एक और Earth Observation Satellite नहीं है। इसकी खासियत यह है कि जियोसिंक्रोनस कक्षा से यह बड़े क्षेत्रों की लगातार निगरानी में मदद कर सकता है। यही क्षमता इसे मौसम, आपदा प्रबंधन से लेकर रणनीतिक निगरानी तक के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।

Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: September 4, 2026 8:51 pm

EOS-05 को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसकी “लगातार निगरानी” की क्षमता को लेकर है। आम पृथ्वी-अवलोकन उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए अलग-अलग समय पर किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं। इसके विपरीत जियोसिंक्रोनस कक्षा में मौजूद उपग्रह किसी निश्चित क्षेत्र पर लंबे समय तक निगाह रखने के लिए अधिक अनुकूल स्थिति में होता है। इसका मतलब है कि किसी तेजी से बदलती परिस्थिति की तस्वीर और जानकारी हासिल करने में अंतरिक्ष आधारित निगरानी की उपयोगिता बढ़ सकती है।

मौसम की निगरानी से आगे की कहानी

EOS-05 को केवल मौसम उपग्रह कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। इसका मूल उद्देश्य Earth Observation और high-resolution imaging है। लेकिन इससे मिलने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल मौसम और प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में भी किया जा सकता है।

चक्रवात तेजी से विकसित हो रहा हो, किसी इलाके में बाढ़ का विस्तार हो रहा हो, जंगल में आग लगी हो या किसी बड़े भू-भाग में अचानक बदलाव आया हो—ऐसी परिस्थितियों में लगातार उपलब्ध होने वाली उपग्रह आधारित तस्वीरें प्रशासन को स्थिति समझने और प्रतिक्रिया की योजना बनाने में मदद कर सकती हैं।

कृषि, वन एवं पर्यावरण निगरानी, जल संसाधन प्रबंधन और भूमि उपयोग जैसे क्षेत्रों में भी पृथ्वी-अवलोकन आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

लेकिन इस मिशन का एक और पहलू है जो इसे रणनीतिक महत्व देता है।

36 हजार किमी से सीमा पर नजर

जियोसिंक्रोनस कक्षा से बड़े क्षेत्र पर निगरानी की क्षमता का इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा निगरानी में भी किया जा सकता है। यही कारण है कि कुछ मीडिया रिपोर्टों ने EOS-05 को भारत की नई “आंख” और “Eye in the Sky” जैसे शब्दों से संबोधित किया है।

यहां यह समझना जरूरी है कि उपग्रह किसी सीमा चौकी की तरह जमीन पर मौजूद हर गतिविधि को सीधे देखने वाला कैमरा नहीं है। लेकिन बड़े क्षेत्र की लगातार निगरानी और समय के साथ होने वाले बदलावों को पकड़ने की क्षमता रणनीतिक योजना के लिए उपयोगी हो सकती है।

यानी इस मिशन का महत्व सिर्फ इस बात में नहीं है कि भारत ने एक और उपग्रह अंतरिक्ष में भेज दिया, बल्कि इस बात में है कि भारत की अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमता अब किस दिशा में बढ़ रही है।

पांच साल पुरानी कहानी का नया अध्याय

EOS-05 की सफलता को 2021 की घटना से अलग करके देखना भी मुश्किल है। उस समय GSLV-F10 के जरिए भेजे गए EOS-03/GISAT मिशन को तकनीकी समस्या के कारण सफलता नहीं मिली थी। वह मिशन जियोसिंक्रोनस कक्षा से पृथ्वी की निगरानी की दिशा में भारत की महत्वाकांक्षी परियोजना का हिस्सा था।

अब पांच साल बाद GSLV-F17 के जरिए EOS-05 की सफलता को उस लंबे प्रयास के अगले महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है।

इस लिहाज से शुक्रवार की सफलता ISRO के लिए सिर्फ एक सफल प्रक्षेपण नहीं, बल्कि एक ऐसी तकनीकी क्षमता की वापसी है जिसे भारत लंबे समय से विकसित करने की कोशिश कर रहा था।

EOS-05 क्यों खास?

• पहली बड़ी विशेषता: भारत का पहला imaging satellite जिसे geosynchronous orbit से पृथ्वी की इमेजिंग के लिए तैयार किया गया है।

• ऊंचाई: लगभग 36 हजार किलोमीटर की कक्षा।

• मुख्य उद्देश्य: पृथ्वी का अवलोकन और इमेजिंग।

• संभावित उपयोग: मौसम एवं आपदा निगरानी, कृषि, पर्यावरण, जल संसाधन और भूमि अध्ययन।

• रणनीतिक उपयोग: बड़े क्षेत्रों की लगातार निगरानी से राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा संबंधी गतिविधियों के आकलन में मदद।

• लॉन्च वाहन: GSLV-F17।

2021 से 2026 तक की कहानी

2021: GSLV-F10 से EOS-03/GISAT मिशन का प्रक्षेपण सफल नहीं रहा।

इसके बाद: जियोसिंक्रोनस कक्षा से पृथ्वी की उच्च क्षमता वाली इमेजिंग के लक्ष्य को आगे बढ़ाने पर काम जारी रहा।

2026: GSLV-F17 ने EOS-05 को सफलतापूर्वक निर्धारित कक्षा में पहुंचाया।

अब: भारत के पास जियोसिंक्रोनस कक्षा से पृथ्वी-अवलोकन की एक नई क्षमता विकसित करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

सिर्फ एक उपग्रह नहीं, निगरानी की नई सोच

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब उस दौर में पहुंच चुका है जहां किसी मिशन की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि रॉकेट ने उपग्रह को कक्षा में पहुंचा दिया या नहीं। असली सवाल यह है कि उस उपग्रह से जमीन पर भारत की क्षमताएं कितनी बढ़ती हैं।

EOS-05 इसी बदलाव का उदाहरण है। इसकी तस्वीरें और आंकड़े मौसम वैज्ञानिकों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों, कृषि एवं पर्यावरण विशेषज्ञों और रणनीतिक संस्थानों के लिए अलग-अलग तरीके से उपयोगी हो सकते हैं।

इसलिए शुक्रवार की सुबह श्रीहरिकोटा से हुई यह उड़ान अंतरिक्ष में एक उपग्रह भेजने की घटना से कहीं बड़ी है। यह भारत की उस महत्वाकांक्षा का संकेत है जिसमें आसमान से मिली जानकारी को जमीन पर तेज फैसलों और बेहतर निगरानी की ताकत में बदला जा सके।

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