अयोध्या में दीपोत्सव का कार्यक्रम शनिवार सुबह 10 बजे साकेत महाविद्यालय से रामायणकालीन झांकियों की शोभायात्रा के साथ शुरू हुआ। लगभग तीन किलोमीटर लंबी इस यात्रा में 13 राज्यों के सांस्कृतिक दलों ने हिस्सा लिया। यात्रा रामपथ होते हुए रामकथा पार्क पहुंची। दोपहर करीब 2:30 बजे उपराष्ट्रपति अयोध्या पहुंचे। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दर्शन-पूजन किया। इसके बाद रामकथा पार्क में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के स्वरूपों का स्वागत, भरत मिलाप और प्रतीकात्मक राज्याभिषेक का कार्यक्रम हुआ।
शाम को सरयू तट पर महाआरती के बाद दीप प्रज्ज्वलन का मुख्य आयोजन हुआ। प्रशासन की निर्धारित कार्यक्रम-सारणी के अनुसार शाम 6 बजे से 6:25 बजे तक 56 घाटों पर एक साथ दीप जलाए गए। इसके बाद 3-डी लेजर शो, प्रोजेक्शन मैपिंग और ड्रोन प्रदर्शन हुआ। रात लगभग 7:50 बजे संगीत के साथ हरित आतिशबाजी के जरिए मुख्य कार्यक्रम का समापन निर्धारित था।
2,100 ड्रोन ने आसमान में जीवंत की रामायण
इस बार दीपोत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण 2,100 से अधिक स्वदेशी ड्रोन का प्रदर्शन रहा। इन ड्रोन के माध्यम से आसमान में रामायण के विभिन्न प्रसंगों को प्रदर्शित किया गया। राम के वनवास, रावण पर विजय और अयोध्या वापसी की झलकियों ने दर्शकों को आकर्षित किया। सरयू के 56 घाटों पर 30 लाख से अधिक दीकजलाए गए। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर में भी एक लाख दीयों से सजावट की गई। इस विशाल आयोजन में 35 हजार से अधिक स्वयंसेवकों ने योगदान दिया।
8 नवंबर को दीपावली, राम के अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ा पर्व
अयोध्या के इस आयोजन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 8 नवंबर को देशभर में दीपावली मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा करने और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने पूरी नगरी को दीपों से रोशन किया था। इसी परंपरा को दीपावली के पर्व से जोड़ा जाता है। अयोध्या का दीपोत्सव उसी ऐतिहासिक और धार्मिक स्मृति का सामूहिक पुनर्स्मरण है। अंतर इतना है कि उस समय नगरवासियों ने अपने घरों और गलियों में दीप जलाए थे, जबकि आज लाखों दीयों, आधुनिक तकनीक और व्यापक जनभागीदारी के जरिए इस परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान वाला आयोजन बनाया जा रहा है।
1.71 लाख से 30 लाख तक पहुंचा दीपोत्सव
अयोध्या में दीपोत्सव की शुरुआत वर्ष 2017 में लगभग 1.71 लाख दीयों से हुई थी। इसके बाद हर साल इसका विस्तार होता गया। वर्ष 2025 में 26,17,215 दीये जलाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया गया था। इस बार 30 लाख से अधिक दीयों के साथ पिछले आंकड़े को पीछे छोड़ने का दावा किया गया है। हालांकि, नए गिनीज रिकॉर्ड के औपचारिक प्रमाणन की पुष्टि अलग से जरूरी है।
आस्था के साथ पर्यटन और अर्थव्यवस्था का भी सवाल
अयोध्या का दीपोत्सव अब केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह गया है। इसके साथ पर्यटन, स्थानीय रोजगार, हस्तशिल्प, सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक तकनीक भी जुड़ गई है। कुम्हारों से लेकर होटल, परिवहन और छोटे कारोबारियों तक इस आयोजन का आर्थिक प्रभाव पहुंचने की संभावना है। हालांकि, इस भव्यता की वास्तविक सफलता का आकलन इस बात से भी होना चाहिए कि अयोध्या के स्थानीय लोगों को इससे कितना स्थायी रोजगार और बेहतर नागरिक सुविधाएं मिल रही हैं। दीपावली से ठीक पहले रामनगरी का यह आयोजन एक बड़ा सांस्कृतिक संदेश दे रहा है—अयोध्या में जलने वाले दीप केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का माध्यम भी बन चुके हैं।
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