आओ नये साल पर फिर एक कविता लिखते हैं
– रामनाथ राजेश
तुम्हारी आँखों पर—
जिनमें डूबा मैं,
तेरे बालों पर,
तेरे गालों पर,
तेरी उन कलाइयों पर—
जिनमें एक में घड़ी थी,
जिसने हम दोनों की तरह
इंतज़ार करना
कभी नहीं सीखा।
सबसे खूबसूरत थीं तुम्हारी आँखें,
जो पहचान न सकीं।
मुझे आत्मज्ञान का गुरूर था—
तुम्हें आत्मा कहा और
अपने भीतर छिपा लिया।
मैं घर लौट रहा था…
तब तक तुम
खुद को खो चुकी थीं।
तुम्हारे खुले बाल,
तुम्हारे आँसू—
मुझे बुलाते रहे।
पर जाने वाला
कहाँ लौटता है?
तुम शरीर होकर जीने लगीं,
पहले राज्य और फिर देश की सीमा के पार
मैं आत्मा को अंदर छुपाए, रोज बतियाते हुए।
दुनिया बहुत छोटी थी—
बिछड़कर कहाँ जाते हम?
हम फिर मिले,
पर कोरोनाकाल के
संक्रमित मरीज की तरह—
जहाँ दूर से देखते रहे,
हां,ऑक्सीजन देने
करीब नहीं गए।
मालूम है, एक दिन आत्मा भी
इस शरीर का साथ छोड़ देगी—
हम दोनों की तरह।
उस दिन
तुम आज़ाद हो जाना,
आँसुओं की जगह
मुस्कुरा देना अपनी आज़ादी पर।
तुम्हारी मुस्कान
मेरे सफ़र को
आसान कर देगी।
सुन्दर कविता!सभी पाठकों को कवि के साथ नए वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएँ!