अर्जुन मुंडा ने कहा कि भारत आर्यावर्त भी है और जम्बुद्वीप भी। यह मौका है कि हम खुद को समझें। दुर्भाग्य से आजादी के बाद के काल में हमारी सांस्कृतिक विरासत राजनीति की भेंट चढ़ गई। इस विरासत में हमारी आध्यात्मिक ताकत है, जो आज दिखाई देने लगी है। इस सत्र को भाजपा प्रवक्ता डॉ. गुरु प्रकाश पासवान, प्राच्य विद्या के विशेषज्ञ डॉ. विनोद तिवारी, डॉ. कौशल पंवार, डॉ. राजेश पासवान और डॉ. राजीव कुमार वर्मा ने भी संबोधित किया।
इसके बाद, ‘पं. रामकिंकर उपाध्याय की दृष्टि में रामराज्य का भाव’ विषयक सत्र में रामकथा के मर्मज्ञ पं. रामकिंकर उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत रामराज्य की उस गहन अवधारणा पर विचार किया गया, जो केवल शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के रूपांतरण से जुड़ी है। इस सत्र में पं. रामकिंकर उपाध्याय की मानसपुत्री और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी दीदी मां मंदाकिनी रामकिंकर, आचार्य कृष्णकांत, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव, पूर्व आईएएस राजीव गुप्ता एवं रामकथा मर्मज्ञ देवेंद्र रावत ने अपने विचार प्रस्तुत किए। दीदी मां मंदाकिनी ने कहा कि जब भगवान राम की राजधानी और राष्ट्र की राजधानी मिल जाएं, तो परम मंगल का सूचक होता है। उन्होंने पं. रामकिंकर उपाध्याय के कृतित्व और व्यक्तित्व पर विस्तार से बताया और कहा कि रामराज्य के संभव होने के लिए राम के साथ-साथ भरत, हनुमान और लक्ष्मण की भी आवश्यकता होती है। भगवान राम और भरत दो व्यक्ति नहीं, दो विचारधारा हैं।
मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि पं. रामकिंकर उपाध्याय माता शबरी को रामराज्य के प्रथम दो नागरिकों में गिनते थे। एक थे केवट और दूसरी थीं शबरी। रामराज्य में नागरिकता का एक ही आधार था, और वह था भक्ति। उनके अनुसार, रामराज्य कल्पना नहीं, ऐतिहासिक सत्य है। रामराज्य किसी इंजीनियरिंग से, किसी पंचवर्षीय योजना से नहीं आएगा, यह भाव से आएगा। उन्होंने कहा, रामराज्य में राजा सेवा करने के लिए है, सेवा लेने के लिए नहीं। राम का नेतृत्व सेवा में है, पावर में नहीं।
आचार्य कृष्णकांत ने कहा, प्राण प्रतिष्ठा दो तरह की होती है। एक अचल प्रतिष्ठा – जिसमें भगवान को गर्भगृह में स्थापित कर देते हैं और भक्त भगवान के पास दर्शन के लिए आते हैं। दूसरी है- चल प्रतिष्ठा, जिसमें भगवान दर्शन देने भक्तों के पास जाते हैं। अयोध्या पर्व के रूप में दिल्ली में अयोध्या की चल प्रतिष्ठा हुई है। देवेंद्र रावत ने कहा, श्रद्धा हृदय में होनी चाहिए, भक्ति हृदय में होनी चाहिए। सत्र के अंत में, अयोध्या पर्व के संयोजक और फैज़ाबाद के पूर्व सांसद लल्लू सिंह ने वक्ताओं, अतिथियों एवं आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
शाम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को भक्ति और Aesthetic से सराबोर कर दिया। पहली प्रस्तुति में माधवी मधुकर झा ने संस्कृत स्तोत्र गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद, प्रेरणा अग्रवाल द्वारा लिखित और नवीन अग्रवाल द्वारा निर्देशित नाट्य प्रस्तुति ‘शबरी के राम’ ने दर्शकों का मन मोह लिया। इस नाटक में शबरी और भगवान राम की कथा के उन अनछुए आयामों को प्रस्तुत किया गया, जो शबरी की अनंत जन्मों की भक्ति और प्रतीक्षा को उजागर करते हैं। नाटक ने भगवान राम के वनवास, सीताहरण और शबरी तक पहुंचने की यात्रा को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से चित्रित किया।
ये भी पढ़ें :-अयोध्या पर्व 2026 : ‘राष्ट्र की रक्षा भगवान राम के आदर्श से ही संभव’