अपने छोटे जीवन काल में कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति कितना कुछ कर लेता है यह उसके पूरे योगदान की जानकारी मिलने के बाद ही पता लगता है . इस पुस्तक को हरिशंकर शर्मा जी ने प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कमल किशोर गोयनका जी को समर्पित किया है. शर्मा जी ने कथावाचक राधेश्याम जी के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है. इससे पूर्व प्रायः कोई भी पुस्तक इतने विस्तार से राधेश्याम के योगदान के बारे में जानकारी नहीं देती है.
पुस्तक की भूमिका में हरिशंकर शर्मा जी लिखते हैं : “पं राधेश्याम कठवाचक जी ने अपनी रचनाओं द्वारा देश की आत्मा को झकझोरने का काम किया है।वे अपने युग के निर्विवाद नायक हैं।उन्होंने साहित्य, नाटक, सिनेमा, डायरी, गीत-ग़ज़ल, भजन, पत्रकारिता, कथावाचन आदि विधाओं के विकास में उनका अप्रतिम योगदान रहा है। उनकी कीर्ति आज भी जिंदा है क्योंकि लोकजीवन से जुड़ा व्यक्ति कभी नहीं मरता ।……”
शर्मा जी आगे लिखते हैं : “इन नाटकों में उन्होंने किसान, मजदूर, सूदखोर सेठ,ग्रामीण परिवेश, शहरी जीवन,धर्म-समाज, शिक्षा ,स्त्री स्थिति अनेक नए प्रसंग भी हैं।….” हरिशंकर शर्मा ने इस पुस्तक में अलग अलग खंडों में राधेश्याम जी के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों के बारे में जानकारी दी है. पुस्तक के अनुक्रम में दिए कुछ खंडों को देखिए: विमर्श-खंड/धन्ना भगत/उद्धार/आज़ादी2/फ़िल्म श्रीसत्यनारायण/राष्ट्रनायकों को समर्पित’श्री कृष्णावतार’/’श्रीकृष्ण-सुदामा’: मित्रता का आदर्श/श्रवण कुमार: नाटक से फ़िल्म तक/ फ़िल्म पटकथा’सत्य दर्शन’/ पटकथा के फुटनोट्स/रामायण के कथा सूत्रों की तलाश ” रचना -खण्ड ————— इस खण्ड के अंतर्गत अध्याय हैं धन्ना भगत/उद्धार और आज़ादी. 266 पृष्ठ के इस पुस्तक में शर्मा जी ने राधेश्याम कठवाचक के जीवन के बारे में तो रोचक, क्रमबद्ध जानकारी दी ही है, कुछ कृतियों को भी शामिल किया है. इस पुस्तक का महत्व हिंदी साहित्य के नाटक ,नाटक लेखन और फिल्मों को समझने में सहायक होगी.
पुस्तक के अंत में ऐतिहासिक फ़ोटो को शामिल कर लेखक ने इसे विशेष आकर्षक बना दिया है! पुस्तक के प्रकाशक को कॉपी एडिटिंग में थोड़ा विशेष ध्यान देना चाहिए था .हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन में प्रूफ रीडिंग पर ध्यान देने की आवश्यक है . पुस्तक का मुखपृष्ठ और छपाई आकर्षक है. पुस्तक पठनीय है और संग्रहणीय भी.
पुस्तक: रंग राधेश्याम, लेखक: हरिशंकर शर्मा
पृष्ठ: 266, मूल्य: रु.300 प्रकाशक: वेरा प्रकाशन, जयपुर

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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