इस पूरे प्रकरण में लाखों शरणार्थी भी थे जो विस्थापित होकर भारत आये थे. भारत पाकिस्तान के विभाजन पर यूं तो सैकड़ों कहानियां और दर्जनों उपन्यास बहुत सारी भारतीय भाषाओं में भी लिखे गए हैं .पर इन लिखे गए उपन्यासों में सलमान रश्दी के अंग्रेज़ी उपन्यास ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’,राही मासूम रज़ा द्वारा लिखित हिंदी उपन्यास आधा गांव, उषाकिरण खान द्वारा मैथिली में लिखित उपन्यास ‘हसीना मंज़िल” और अब्दुस्समद द्वारा लिखित उर्दू उपन्यास “दो ग़ज़ ज़मीन” विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं .
लगभग आठ दशकों बाद भी भारत के हुए सन 47 के बंटवारे से विभिन्न स्तरों पर आहत लोगों की व्यथा कथा-कहानी में उभर कर आ ही जाती है. इस उपन्यास “आलोकुठि” में विजय गौड़ जी ने 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद परिवर्तित परिस्थिति और अल्पसंख्यक हिन्दू आबादी की परिस्थिति का जीवंत वर्णन किया है. प्रायः इस परिस्थिति पर कोई और उपन्यास नहीं लिखा गया है. काफी जद्दोजहद के बाद बांग्लादेश से विस्थापित इन लोगों को सुंदरबन के पास बसाया जाता है. इन प्रवासियों की कथा कहने में लेखक उनके मूल स्थान की भी चर्चा करता है. इसी बहाने यह भी बात सामने आने लगती है कि सैकड़ों वर्षों के विश्वास ,सद्भाव और अपनापन को व्यक्तिगत स्वार्थ और धार्मिक उन्माद ने एक तरह से दफन कर दिया. उपन्यास बहुत ही रोचक है और एक बार शुरू करने पर समाप्त करने के बाद ही छोड़ने का मन करेगा! विश्व साहित्य में विभाजन,पलायन और विस्थापन पर जितनी भी कहानियां लिखी गयी हैं उसमें मानव जीवन के संकट और पीड़ा का बहुत मार्मिक वर्णन है.
विजय गौड़ जी ने पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने की परिस्थिति का बहुत ही जीवंत वर्णन प्रस्तुत किया है उपन्यास में. एक बानगी देखिये : “वह निर्णायक होता हुआ क्षण था।नरेन्द्रनाथ बागची को भी अपने दादा सुबलनाथ बागची की जिद के आगे हथियार डाल देने पड़े। निर्णय हो गया कि सारी जायदाद बेच दो और यहाँ से निकलकर कलकत्ता में बसेरा किया जाए जबकि इस पर हो चाहे उस पार साम्प्रदायिकता की आग एक तरह से सुलग रही है,जो जहाँ अल्पसंख्यक, वह वहां उठती हुई लपटों को देख सकता था और चपेट में आने को मजबूर था। जान-माल की सलामती के लिए एक अफरा-तफरी दोनों ही ओर मची हुई थी, लेकिन नरेन्द्रनाथ बागची के भीतर विश्वास की एक डोर कायम थी।…..” यह उपन्यास बहुत रोचक भाषा में लिखा गया है, पठनीय है और संग्रहणीय है.
उपन्यास:आलोकुठि लेखक:विजय गौड़ ,पृष्ठ:230
प्रकाशक:राजकमल पेपरबैक्स, मूल्य: रु.299

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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भारतीय उपन्यास परंपरा में विभाजन और विस्थापन एक बड़ा विषय रहा है। सलमान रश्दी के Midnight’s Children, राही मासूम रज़ा के आधा गांव, उषाकिरण खान के हसीना मंज़िल और अब्दुस्समद के दो गज़ ज़मीन जैसी रचनाएँ इस संवेदना को गहराई से चित्रित करती हैं। लेकिन आलोकुठि के इस अंश को पढ़कर ऐसा लग रहा है कि यह इस परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ता है, क्योंकि यह 1971 की घटना और बांग्लादेश से आए शरणार्थियों की पीड़ा को केंद्र में रखता है—ऐसा विषय जिस पर साहित्य में अपेक्षाकृत कम लेखन हुआ है।
उपन्यास की समीक्षा से इसकी विषय वस्तु और समय का पता चलता है और फिर पढ़ने की उत्कंठा होती है,यह श्री प्रमोद झा जी की लेखनी की विशेषता है।
लेखक और समीक्षक दोनों को बधाई!
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