डॉ. मीनाक्षी जैन की विद्वता और व्यक्तित्व ने इस कार्यक्रम को एक विशिष्ट गरिमा प्रदान की। यह कोई पारम्परिक सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि यह एक ऐसा मंच था, जहां प्रामाणिकता व्याप्त थी, जहाँ हर किसी ने वही कहा, जो वे महसूस करते हैं। इसमें किसी प्रकार शब्दों का आडंबर नहीं था, सिर्फ सच्ची भावनाएं थीं। औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के बजाय, भारतीय रीति-रिवाज़ के अनुसार, शुरुआत में ही आभार व्यक्त किया गया, जिससे यह पुष्टि हुई कि यह आयोजन जितना व्यक्तिगत था, उतना ही सभ्यतागत भी था।
वक्ताओं में आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, इंडिका के संस्थापक हरि किरण वडलामणि, आईजीएनसीए के ट्रस्टी पद्मश्री डॉ. भरत गुप्त, इंडिका के कुलपति भारतीय विद्या विभूति डॉ. नागराज पटुरी, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष गौतम चिकरमाने, वैज्ञानिक, लेखक और बुद्धिजीवी प्रो. आनंद रंगनाथन, अर्थशास्त्री, इतिहासकार और प्रधान मंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री सहित अन्य कई लोग शामिल थे। पद्मश्री प्रो. सुभाष काक और प्रो. मकरंद परांजपे ने ऑनलाइन माध्यम से इस विशिष्ट कार्यक्रम में सहभागिता की।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने राज्यसभा में एक विशुद्ध अकादमिक शख़्सियत को नामित करने के भारत सरकार के कदम की व्यापक प्रशंसा की और कहा कि यह डॉ. मीनाक्षी जैन के योगदान को मान्यता तो है ही, इससे उच्च सदन राज्यसभा की गरिमा भी बढ़ी है। प्रो. आनंद रंगनाथन ने कहा कि डॉ. जैन का नामांकन राज्यसभा के सम्मान को बढ़ाता है। गौतम चिकरमाने ने एक मार्मिक कविता सुनाई, जिसमें उन्होंने डॉ. जैन को अभिमन्यु बताया, जिसने अंततः विजय प्राप्त की। डॉ. भरत गुप्त ने मध्यकालीन इतिहास को स्पष्ट करने के लिए उनकी विद्वत्ता की प्रशंसा की, जबकि डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने उनकी अटूट ईमानदारी की चर्चा की। संजीव सान्याल ने उनकी विनम्रता और दृढ़ता की सराहना की और बताया कि कैसे उनके कार्य ने उन्हें लंबे समय से प्रेरित किया है। विवेक अग्निहोत्री ने डॉ. जैन को अपनी डॉक्यूमेंट्री ‘कश्मीर अनरिपोर्टेड’ में उनके योगदान के लिए धन्यवाद दिया और इस बात पर प्रकाश डाला कि उन्होंने खुद के लिए प्रचार पाने से इनकार कर दिया और इसके बजाय अपने काम को बोलने दिया। अन्य वक्ताओं ने उनकी शोध यात्रा में उनके द्वारा दी गई उदारता को याद किया।
डॉ. मीनाक्षी जैन ने अपने संबोधन में अपने शोध, अध्ययन, लेखन के उन संघर्ष से भरे एकाकीपूर्ण वर्षों का स्मरण किया, जब उनके कार्यों को मान्यता नहीं दी जा रही थी। और, यह एक ख़ास वर्ग द्वारा जान-बूझकर किया जा रहा था। उन्होंने हरि किरण वदलमणि के नेतृत्व वाली इंडिका संस्था से महत्वपूर्ण समय में मिले प्रोत्साहन और सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने एक लेखिका और विद्वान के रूप में उन्हें सक्षम बनाने में संस्था की भूमिका की सराहना की। उन्होंने इस सम्मान समारोह के लिए आईजीएनसीए को भी धन्यवाद दिया।
सम्मान समारोह का समापन डॉ. मीनाक्षी जैन को शॉल, पट्टिका, स्मृति चिन्ह और उनकी आगामी पुस्तक ‘राजा भोज परमार: रिमेम्बरिंग द स्कॉलर किंग’ की प्रथम प्रति भेंट करके किया गया। आईजीएनसीए और इंडिका की ओर से सभी गणमान्य व्यक्तियों, सहकर्मियों और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया गया, जिनकी उपस्थिति ने इस समारोह को यादगार बना दिया।
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