गार्गी को “ब्रह्मवादिनी कहा जाता है क्योंकि वह ब्रह्म (परम वास्तविकता, Brahman) के स्वरूप और अनुभूति की खोज में बहुत निष्ठावान थीं। विदुषी गार्गी एक ऐसी महिला थीं, जो ब्राह्मण-सभा और दार्शनिक परंपरा में पुरुषों के साथ समान रूप से बैठकर ब्रह्म-चर्चा कर सकती थीं। सच्ची विद्या, दान या मोहरों की होड़ नहीं है। भारतीय ज्ञान की परंपरा में गार्गी जैसी महान स्त्री ने निर्भीकता से बुद्धि और सत्य के शिखर छुआ। ब्रह्मवादिनी गार्गी वैदिक युग की अनेक दुर्लभ विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने पुरुषों के साथ शास्त्रार्थ किया और ब्रह्म जैसे परम सत्य पर अत्यंत तीखे और गहरे प्रश्न पूछे।
महान याज्ञवल्क्यजी के साथ गार्गी की महान तर्क-प्रतिस्पर्धा :
राजा जनक ( मिथिला) के दरबार में शास्त्रार्थ आयोजित किया करते थे। राजा जनक ने घोषणा की कि जो श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी होगा, उसी को हजार गायों (प्रत्येक के सींगों पर सोना लगा) का दान मिलेगा। सभा में अनेक महान ऋषियों ने यज्ञवल्क्य को चुनौती दी, लेकिन सभी असफल हुए। अंत में गार्गी, एक विदुषी महिला ने चुनौती दी और दार्शनिक प्रश्नों को उठाया।उनके प्रश्न बहुत सूक्ष्म थे इसलिए याज्ञवल्क्य जैसे महान ऋषि ने गार्गी को सतर्क किया —“गार्गी, आगे न पूछो वरना तुम्हारा ही नहीं, संपूर्ण सभा का संतुलन डगमगा जाएगा।”
मिथिला में राजा जनक प्रतिवर्ष महान ब्रह्मयज्ञ करते थे, जिसमें भारत के श्रेष्ठतम ऋषि— तर्क, ज्ञान और अनुभव की प्रतियोगिता में भाग लेते थे। इस प्रतियोगिता में गार्गी ही एकमात्र स्त्री थीं, जो ज्ञान और शक्ति में सबसे आगे आगे दिख रही थीं। शास्त्रार्थ आरंभ हुआ और गार्गी सीधे ही याज्ञवल्क्य के सामने खड़ी हो गईं।
विदुषी गार्गी ने पहला प्रश्न किया- “हे याज्ञवल्क्यजी! पृथ्वी को कौन धारण करता है ?”
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया-“पृथ्वी को जल धारण करता है।”
गार्गी ने तुरंत दूसरा प्रश्न आगे बढ़ा दिया और पूछा। “तो जल को कौन धारण करता है?”
“जल को वायु धारण करती है।” गार्गी प्रश्नों की वर्षा करने लगी—वायु को अग्नि
अग्नि को आकाश आकाश को दिशाएँ दिशाओं को ब्रह्मलोक। अंत में गार्गी ने पूछा—
“हे याज्ञवल्क्यजी! अंत में यह सब किसके द्वारा धारण किया गया है ?”
तुरन्त याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया-“सब कुछ अक्षर ब्रह्म द्वारा धारण किया हुआ है,
वह न जन्म लेता है, न मरता है;न छोटा है, न बड़ा; उसे आँख नहीं देख सकती, कान नहीं सुन सकते । हर जगह वही है, वही है, वही स्वयं प्रकाश है और यही परम सत्य है।”
सभा मौन हो गई। लेकिन गार्गी रुकी नहीं। उनका अगला प्रश्न और भी गहरा था। थोड़ी देर बाद फिर से गार्गी ने फिर से महान प्रश्न पूछा: “हे याज्ञवल्क्यजी! जिस ‘अक्षर ब्रह्म’ के वश में सूर्य, चंद्रमा, तारे हैं पृथ्वी और आकाश तक
सब बँधे हुए हैं, वह अदभुत ब्रह्म क्या है?”
इस प्रश्न ने अस्तित्व की जड़ को छूआ था। तब याज्ञवल्क्य सतर्क करते हुए बोले- हे गार्गि! तुम्हारे खतरनाक प्रश्नों से मेरा सिर फट जाएगा।और पूछोगी तो यह प्रश्न तुम्हें नष्ट कर देगा क्योंकि इस प्रश्न में ब्रह्म का अत्यंत गूढ़ रहस्य है। याज्ञवल्क्य ने अंतिम उत्तर में कहा –
“हे गार्गी, उस ब्रह्म को
न स्पर्श किया जा सकता है,
न देखा ही जा सकता है और
न पकड़ा जा सकता है।
उसमें कोई रूप नहीं, लेकिन उससे सब रूप उत्पन्न होते हैं।
उसे पकड़ा नहीं जा सकता न छोड़ा जा सकता।
वह सूक्ष्मतम है फिर भी समस्त ब्रह्मांड उसका विस्तार है।
सब उसी में स्थित हैं,
और उसी में विलीन हो जाते हैं।
वह ब्रह्म—सबका आधार है, लेकिन उसका स्वयं का कोई आधार नहीं है।
पूरी सभा मौन हो गई तब
गार्गी शांत हुईं, झुकीं और बोली
“नमस्कार याज्ञवल्क्यजी। वास्तव में आप ब्रह्मज्ञानी हैं।”
गार्गी केवल प्रश्न नहीं पूछ रहीं थीं, बल्कि वह संपूर्ण मानवता को सत्य का संदेश दे रही थीं। उन्होंने कहा –
ज्ञान को पकड़ो, सत्य को खोजो
प्रश्न करने से न डरो, जब मन स्वतंत्र है, तभी ब्रह्म की अनुभूति संभव है।
गार्गी और याज्ञवल्क्य के बीच के संवाद ने भारतीय दर्शन की ऊँचाइयों को छूआ है।
सत्य और ब्रह्म के प्रश्न किसी एक लिंग या वर्ग तक सीमित नहीं हैं। प्रकृति अपनी कृपा बिना लिंग भेद के सब पर बरसाती है। विदुषी गार्गी एक दीपक की भांति है जिसने प्रत्येक साधक से कहा कि “प्रश्न पूछने वाले को ही परम सत्य प्राप्त होता है।”

[मृदुला दुबे योग शिक्षक और अध्यात्म की जानकार हैं]
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