हर गोरखनाथ मंदिर की धूनी केवल राख नहीं, साधक की भीतरी जागृति का प्रतीक है। गुरु कहते थे —”बाहर की धूनी जलाओ, पर भीतर की धूनी मत बुझने दो।”
यह वही अग्नि है जो वासनाओं को भस्म कर आत्मा को शुद्ध करती है। गोरखनाथ को आठों महा सिद्धियाँ प्राप्त थीं — अणिमा से ईशित्व तक।फिर भी वे चेतावनी देते थे। उनके लिए सच्ची सिद्धि आत्म-नियंत्रण थी, न कि चमत्कार प्रदर्शन। उन्होंने कहा — शरीर ही ब्रह्मांड है।जब साधक इड़ा (चंद्र) और पिंगला (सूर्य) को संतुलित करता है,तो सुषुम्ना खुलती है — और वहीं से कुंडलिनी की यात्रा आरंभ होती है।
ध्यान — “मन के भीतर मन”
“मन के भीतर मन है, ध्यान के भीतर ध्यान।
जो भीतर देखे, वही जान पाए ज्ञान।”
गोरखनाथ के अनुसार सच्चा ध्यान तब होता है जब देखने वाला, देखा जाने वाला और देखने की प्रक्रिया — तीनों मिट जाएँ। उन्होंने शरीर को अमर बना देने की “काया सिद्धि” पाई थी।
“शरीर मिट्टी नहीं, मंदिर है। जो इसे साध ले, वह अमृत को पा ले।”
किवदंती है कि वे आज भी हिमालय में साधना कर रहे हैं —या हर उस हृदय में जीवित हैं जो “अलख निरंजन” का जाप करता है।उनकी वाणी स्वयं मंत्र थी।“अलख निरंजन” का उच्चारण सुनते ही वातावरण बदल जाता —भय मिट जाता, चेतना जग उठा। “शिव बिना शक्ति नहीं, शक्ति बिना शिव नहीं।”उनकी साधना में यही एकत्व सर्वोच्च योग था —जहाँ भीतर की ऊर्जा (शक्ति) शिवचेतना में विलीन हो जाती है।
गोरखनाथ का संदेश:
“जितनी बार तू भीतर जाएगा, उतनी बार बाहर का संसार बदलता जाएगा।” योग, उनके लिए, अपने भीतर परमात्मा से मिलन था —और यही मानव जीवन का सच्चा उद्देश्य।
मत्स्येन्द्र से गोरखनाथ तक यह परंपरा योग, तंत्र और भक्ति का संगम है।आज भी जब कोई साधक “अलख निरंजन” कहता है —
तो गोरखनाथ की वही चेतना उसके भीतर जीवंत हो उठती है।

(मृदुला दुबे योग शिक्षक और अध्यात्म की जानकर हैं।)
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