प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान के बीच हुई उच्चस्तरीय वार्ता में दोनों देशों ने 2030 के दशक की शुरुआत तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया। मौजूदा समय में भारत-यूएई व्यापार 100 अरब डॉलर के आसपास है और इसे दोगुना करने की दिशा में यह बड़ा कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है।
बैठक का सबसे बड़ा ठोस परिणाम ऊर्जा क्षेत्र में सामने आया। भारत की हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) और यूएई की ADNOC गैस के बीच लगभग 3 अरब डॉलर का दीर्घकालिक एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) आपूर्ति समझौता हुआ। इसके तहत अगले 10 वर्षों तक भारत को यूएई से गैस की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित होगी, जिसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
रक्षा और सुरक्षा सहयोग को भी नई धार दी गई। दोनों देशों ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिए आशय पत्र (लेटर ऑफ इंटेंट) पर सहमति जताई, जिसके तहत रक्षा उत्पादन, प्रशिक्षण, आतंकवाद विरोधी सहयोग और सुरक्षा तकनीकों में तालमेल बढ़ेगा। इसके अलावा अंतरिक्ष, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स जैसे भविष्य के क्षेत्रों में भी सहयोग पर सहमति बनी।
इस दौरे में निवेश और बुनियादी ढांचे को लेकर भी अहम संकेत मिले। यूएई ने भारत के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, विशेषकर गुजरात के धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन और गिफ्ट सिटी में निवेश बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। अंतरिक्ष क्षेत्र में IN-SPACe और यूएई स्पेस एजेंसी के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी।
कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका के साथ व्यापार और वीजा से जुड़े मुद्दों पर मतभेद उभरे हैं और बांग्लादेश के साथ भी हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते संबंधों में खटास आई है। ऐसे में यूएई के साथ रिश्तों का और मजबूत होना भारत के लिए सामरिक और कूटनीतिक संतुलन की दृष्टि से बड़ी राहत माना जा रहा है।
संयुक्त बयान में दोनों नेताओं ने कहा कि भारत-यूएई संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह व्यापक रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं। लोगों-से-लोगों के संबंध, सांस्कृतिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को भी दोनों देशों ने समान रूप से अहम बताया।
कुल मिलाकर, अमेरिका और बांग्लादेश के मोर्चे पर चुनौतियों के बीच भारत-यूएई साझेदारी का यह विस्तार भारत की विदेश नीति के लिए एक मजबूत सकारात्मक संदेश माना जा रहा है—कि वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भी भारत के पास भरोसेमंद और ताकतवर साझेदार मौजूद हैं।
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