राजा जनक अपार धन-संपत्ति और ऐश्वर्य के स्वामी थे, लेकिन उसमें आसक्त नहीं थे। वे राजमहल में रहते हुए भी योगी के समान जीवन जीते थे। महर्षि याज्ञवल्क्य ने एक बार सभा में जनक से पूछा कि “इस संसार में सबसे अधिक ज्ञानी कौन है?” राजा जनक ने बहुत विनम्रता से उत्तर दिया।
“ जो भी मुझसे अधिक ज्ञानी है, उसे मैं अपना पूरा राज्य उसे दे दूँगा।” ऐसा कहकर जनक ने अपने आत्मविश्वास और ज्ञान के प्रति सम्मान को दर्शाया। अहंकार को नहीं जताया।
एक बार सेवकों ने दौड़ते हुए आकर कहा— “राजा महाराज! पूरा नगर जल रहा है!” तब जनक का चित्त कांपा नहीं और शांत रहते हुए बोले – “केवल मिथिला ही जल रही है, जनक तो नहीं।”
राजा जनक के ऐसा कहने से स्पष्ट होता है कि वे स्वयं को भौतिक वस्तुओं से बिल्कुल अलग रखते थे।
राजा जनक का चित्त कांपता नहीं था और स्थिर रहता था। राजा जनक केवल ज्ञानी ही नहीं, बल्कि एक आदर्श शासक भी थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी और सुरक्षित थी। वे कोई भी निर्णय लेते समय धर्म और विवेक को सर्वोपरि रखते थे।
सीता स्वयंवर का आयोजन केवल एक परंपरा नहीं थी, बल्कि यह राजा जनक की न्यायप्रियता का प्रतीक थी। उन्होंने किसी राजा को कोई विशेष अधिकार नहीं दिया, बल्कि एक शर्त रखी कि जो भी शिव धनुष उठाएगा, वही सीता से विवाह करेगा।
उपनिषदों में राजा जनक और अष्टावक्र के बीच हुए संवाद अत्यंत प्रसिद्ध हैं। वे प्रश्न पूछने से नहीं हिचकिचाते थे और सत्य को जानने की जिज्ञासा रखते थे। महत्वपूर्ण उपनिषद बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य और जनक का संवाद आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष जैसे गूढ़ विषयों को सरल रूप में बताया गया है।
जनक का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान विनम्रता लाता है कर्तव्य और वैराग्य दोनों एक साथ चल सकते हैं। आज भागते दौड़ते समय में राजा जनक का जीवन हमें आंतरिक शांति और संतुलित होने की प्रेरणा देता है।
अष्टावक्र ने जनक को शुद्ध चैतन्य का ज्ञान दिया कि मनुष्य की सहित पहचान शरीर, मन या पद नहीं, बल्कि चैतन्य आत्मा है।अष्टावक्र ने जनक से कहा—हे राजन!“तुम न तो राजा हो, न भोगी, न त्यागी; तुम तो केवल साक्षी आत्मा हो।”
इससे जनक को यह बोध हुआ कि राजसिंहासन भी उनकी कोई पहचान नहीं है। मुक्ति पाने के लिए त्याग आवश्यक नहीं है।
अष्टावक्र ने स्पष्ट किया कि मोक्ष के लिए वनवास या संन्यास आवश्यक नहीं है, बल्कि आसक्ति का त्याग बहुत आवश्यक है। जनक ने कहा ने बताया कि “मैं राज्य करते हुए भी मुक्त हूँ, क्योंकि मैं कर्मों से बिल्कुल भी बँधा नहीं हूँ।”
दुख और सुख मन को अनुभव होने वाली अवस्थाएं हैं। अष्टावक्र ने सिखाया कि सुख और दुःख बाहरी परिस्थितियों के कारण नहीं, बल्कि मन की भावनाओं के कारण अनुभव होते हैं। महर्षि अष्टावक्र ने जनक को साक्षी , दृष्टा भाव सिखाया—हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हम भीतर से निरासक्त रहें।
ऋषि अष्टावक्र ने जनक को बताया कि अहंकार ही बंधन है।
“मैं कर्ता हूँ” ये भावना ही मनुष्य को बाँधती है। ज्ञानी अष्टावक्र के उपदेशों से राजा जनक ने जाना कि वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए निर्लिप्त रहना है। महर्षि अष्टावक्र से राजा जनक ने यह सीखा कि – केवल आत्मज्ञान ही सच्ची मुक्ति है। राजा होकर भी योगी बना जा सकता है संसार में रहते हुए भी बंधन से मुक्त रहा जा सकता है। इसीलिए राजा जनक को जीवनमुक्त कहा जाता है।

(मृदुला दुबे योग शिक्षक एवं अध्यात्म की जानकर हैं।)
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