जब यह अध्यापक दस्तक देता है, तब शोर नहीं होता — एक ख़ामोशी होती है, जो भीतर उतर जाती है। वहीं से आरंभ होता है वह पाठ — जो किसी पुस्तक में नहीं मिलता, पर आत्मा में अमिट छाप छोड़ जाता है।
2. असफलता: एक कलंक नहीं, एक अवसर
पहली नज़र में असफलता एक झटका लगती है। लेकिन वही झटका कभी-कभी चेतना का दरवाज़ा खोल देता है।
वह दर्पण बन जाती है, जिसमें हम पहली बार अपना असली चेहरा देख पाते हैं — बिना मुखौटे, बिना दिखावे के।
सफलता सबको भा रही, असफलता से डर।
जो असफलता को साध ले, जीवन उसका घर।
3. श्रीराम की असफलता
वनवास की गोद में शिक्षा : कल्पना कीजिए — एक युवराज, जिसके राज्याभिषेक की तैयारियाँ चल रही हैं, अचानक वन भेज दिया जाता है। यह कोई सामान्य झटका नहीं था। यह एक ऐसा क्षण था जहाँ कोई भी विद्रोह कर सकता था — पर श्रीराम ने इसे स्वीकार किया। यह उनकी राजा बनने की परीक्षा नहीं थी, यह उनकी मनुष्य बनने की प्रक्रिया थी।
सीख: असफलता में भी गरिमा और विनम्रता बनाए रखना — यही असली नायकत्व है।
4. अर्जुन की हताशा
जब युद्धभूमि बना आत्मज्ञान की भूमि युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन का धनुष गिर गया। एक योद्धा, जो जीवनभर युद्ध के लिए तैयार था — वही युद्ध से पीछे हट गया। परंतु उस हताशा में जन्मी भगवद्गीता — आत्मज्ञान की अमर संहिता।
श्लोक:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…
सीख: असफलता हमें गहराई से सोचने पर विवश करती है। वह हमारी चेतना को झकझोरती है, ताकि हम फल की चिंता छोड़कर कर्म को पूजा बना सकें।
5. आधुनिक मिसालें
एडिसन ने जब 999 बार असफल होकर कहा, “मैं विफल नहीं हुआ, मैंने बस 999 तरीके खोजे जो काम नहीं करते,” तो उन्होंने असफलता को प्रयोगशाला बना दिया।
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जब एयर फोर्स की परीक्षा में फेल हुए, तो लगा सब कुछ खत्म हो गया। पर उसी क्षण उनके भीतर एक बीज बोया गया — जो उन्हें ‘मिसाइल मैन’ और फिर राष्ट्रपति बना गया।
6. आत्ममंथन
जब असफलता के बाद सब शांत हो जाता है। बाहर की दुनिया चुप होती है — पर भीतर की आवाज़ तेज़।
वही आवाज़ पूछती है:
क्या यह मेरा अंत है?
या एक नई शुरुआत?
क्या मुझमें अब भी कुछ बाकी है?
कबीर का दोहा:
कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर…
सीख: असफलता अहंकार को तोड़ती है, और समत्व को जन्म देती है। यही वह क्षण है जब हम अपने भीतर के सत्य से साक्षात्कार करते हैं।
असफलता जीवन का पूर्ण विराम नहीं, बल्कि एक कॉमा है — जो आपको रुककर सोचने, समझने, और फिर नए शब्दों से जीवन की अगली पंक्ति लिखने का अवसर देती है। जो असफलता से भागता है, वह खुद से भागता है। पर जो असफलता को थाम लेता है — वह जीवन को समझने लगता है।
और तब — किताबों से परे — एक और किताब खुलती है।
जिसका लेखक जीवन है, और पाठक — आप।

(मृदुला दुबे योग शिक्षक और अध्यात्म की जानकार हैं।)
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