महर्षि भारद्वाज प्राचीन भारत के अत्यंत प्रतिष्ठित सप्तर्षियों में से एक माने जाते हैं। उनका योगदान आयुर्वेद, व्याकरण, धनुर्वेद, धर्मशास्त्र, शिक्षा, विज्ञान और विमान-शास्त्र तक फैला हुआ है। वे ऋग्वेद के छठे मण्डल के प्रमुख द्रष्टा थे और उन्हें हजारों वर्षों तक जीवित रहने वाला “अपरिमित आयु वाला” ऋषि कहा गया है।
ऋषि का ज्ञान और शिक्षण परंपरा:
महर्षि भारद्वाज को आयुर्वेद का ज्ञान स्वर्ग के राजा इन्द्र से प्राप्त हुआ था, जिसे उन्होंने बाद में चरक, आत्रेय, पुनर्वसु जैसे शिष्यों को प्रदान किया। चरक संहिता में (सूत्रस्थान 1.26) लिखा है कि उन्होंने “अनन्त आयु” के लिए चिकित्सा विद्या का उपदेश दिया था।
“तत्र भारद्वाजः स्वर्गलोकात् आयुर्वेदं प्राप्य पृथिव्यां प्रचरति।”
(चरक संहिता)
उन्होंने प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज) में विश्व का पहला महाविद्यालय (गुरुकुल) स्थापित किया था, जहाँ हजारों छात्र जीवन के विविध आयामों की शिक्षा ग्रहण करते थे।
महर्षि और रामायण:
माघ के महीने में अनेक संतो के साथ याज्ञवल्क्य भी प्रयाग में स्नान के लिए गए ।स्नान के पश्चात भारद्वाजजी ने याज्ञवल्क्य जी से अपने पास रुकने के लिय कहा। एक दिन भारद्वाजजी याज्ञवल्क्य से कहते हैं कि कृपा कर मुझे रामचरित सुना दीजिए। तब वह मंद मंद मुस्करा कर सोचते हैं कि सब कुछ जानते हुए भी भारद्वाजजी मेरे मुख से राम कथा का आनन्द लेना चाहते हैं। तब उन्होंने परम सुख देने वाली राम कथा कही।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में ऋषि भारद्वाज का उल्लेख एक महान तपस्वी और यजमान के रूप में होता है। भगवान श्रीराम अपने वनवास की आरंभिक यात्रा में जब प्रयाग पहुँचे, तब वे ऋषि भारद्वाज के आश्रम में गए और उन्होंने वहाँ रात्रि विश्राम किया।
यह दृश्य तुलसीदास कृत रामचरितमानस में इस प्रकार वर्णित है: “गएँ सुमंत्र समेत रघुनंदन।
तीरथराज जानि मन आनंदन।।
देखे भरद्वाज मुनि सुंदर।
राम लखन सिय सहित मनु मंडल।।”
(अयोध्या कांड, रामचरितमानस)
भारद्वाज मुनि ने राम, लक्ष्मण और सीता को देखकर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया और उन्हें आदरपूर्वक भोजन कराया, विश्राम करवाया। अगले दिन उन्होंने उन्हें चित्रकूट में रहने की सलाह दी:”चित्रकूट बन सुंदर सादा। साधक सदा करत हैं वादा।।”
शिष्य और ज्ञान-परंपरा:
वाल्मीकि रामायण के अनुसार महर्षि भारद्वाज, ऋषि वाल्मीकि के गुरु भी थे, परंतु कुछ परंपराओं में वे उनके समकालीन अथवा सह-धर्मी भी माने गए हैं। दोनों ने तमसा नदी के तट पर क्रौंच वध की घटना देखी, जिसने वाल्मीकि को काव्य रचना की प्रेरणा दी।
भारद्वाज और विमानों का विज्ञान
“यंत्र-सर्वस्व”, ऋषि भारद्वाज द्वारा रचित ग्रंथ है, जिसमें विमान-विद्या अर्थात उड्डयन-विज्ञान का विस्तार से वर्णन है। यह ग्रंथ 20वीं सदी में शिवकुमार भट्टाचार्य द्वारा पुनः प्रकाशित हुआ और आज भी भारतीय प्राचीन विज्ञान की अद्भुत मिसाल माना जाता है।
धर्मशास्त्र और समाज व्यवस्था
ऋषि भृगु से भारद्वाज ने धर्मशास्त्र सीखा। उन्होंने भारद्वाज स्मृति की रचना की जो वैदिक काल की आचार-संहिताओं में गिनी जाती है। यह शास्त्र समाज में मर्यादा, कर्तव्य और नीति का स्पष्ट बोध कराता है।
द्वादश माधव परिक्रमा की स्थापना:
प्रयागराज की द्वादश माधव परिक्रमा की स्थापना भी महर्षि भारद्वाज ने की। ऐसा माना जाता है कि कोई भी अनुष्ठान, जब तक द्वादश माधव की परिक्रमा न की जाए, पूर्ण नहीं होता। उन्होंने तीन उद्देश्यों से इस परिक्रमा की स्थापना की:
प्रयाग का कोई भी अनुष्ठान तब तक पूर्ण न हो जब तक स्थान देवता (माधव) की परिक्रमा न की जाए।

(मृदुला दुबे योग शिक्षक और अध्यात्म की जानकार हैं)
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