मकर संक्रांति : खगोलीय घटना नहीं बल्कि आत्मीय रिश्तों में क्षमा और नवीन आरंभ का प्रतीक

कड़ाके की ठंड की एक सुबह थी। धूप खेतों पर फैल रही थी। ऊपर आकाश में सूर्यदेव बहुत उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे थे। यह दिन बहुत विशेष था। सूर्य देव अपने पुत्र शनिदेव से मिलने जा रहे थे। मकर संक्रांति एक खगोलीय घटना नहीं है बल्कि आत्मीय संबंधों में क्षमा और नवीन आरंभ का प्रतीक है।

Written By : मृदुला दुबे | Updated on: January 13, 2026 11:40 pm

पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्यदेव और उनके पुत्र शनिदेव के संबंध कभी भी प्रेम वाले नहीं थे। शनिदेव का स्वभाव अत्यंत कठोर था। सूर्यदेव भी बहुत तेज और उग्र थे। विचार न मिलने के बाद भी साल में एक बार सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर को शनि की राशि मानी जाती है। एक पिता का अपने पुत्र के घर आने जैसा है। अहंकार को त्यागकर संबंध निभाने का प्रतीक है। इसीलिय मकर संक्रांति को पारिवारिक मेल-मिलाप, सद्भाव और आपसी सम्मान का त्यौहार माना जाता है।

शनि देव के सम्मान में आज काला रंग पहनना शुभ है। लोककथा के अनुसार इस दिन देवी संक्रांति ने संक्रांति नामक असुर का संहार किया था। संहार के अगले दिन देवी ने असुर के अवशेषों को नष्ट किया था । हर प्रकार की बुराई को समूल समाप्त करना आवश्यक है। इसीलिए मकर संक्रांति का दिन दान, प्रेम शुद्धि और नवीनता का उत्सव बन गया है।

पूरे उत्तर भारत में मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी दान की जाती है और खाई भी जाती है। बाबा गोरखनाथ और उनके शिष्यों के लिए भोजन में खिचड़ी एक आदर्श भोजन थी । खिचड़ी बहुत जल्दी कम बनने वाला और सुपाच्य तथा लंबे समय तक ऊर्जा देने वाला भोजन है। भारत के साधु-संतों के द्वारा यह परंपरा घर घर तक पहुँची और धीरे-धीरे मकर संक्रांति एक विशेष त्यौहार बन गया। गोरखपुर और पूरे उत्तर पूर्वी प्रदेश में इस दिन खिचड़ी बनाकर दान की जाती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह विशेष दिन है। आज के दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश कर जाते हैं । संक्रांति को सूर्य उत्तरायण हो जाता है और दिन भी बड़े होने लगते हैं। भारत की संस्कृति में उत्तरायण को प्रेम ,आशा, उन्नति और सकारात्मकता का समय माना जाता है। इसीलिए यह त्यौहार हर साल जनवरी की 14 या 15 तारीख को मनाई जाती है।

भारत के तमिलनाडु में 4 दिन तक चलने वाले इस त्यौहार को पोंगल पर्व कहते हैं। केरल कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी इसे संक्रांति कहा जाता है। पंजाब प्रदेश में लोहड़ी कहते हैं। आज गुजरात में पतंगों का उत्सव होता है। लोहड़ी,पोंगल या मकर संक्रांति प्रकृति का स्वागत और कृतज्ञता व्यक्त करना है।

निष्कर्ष : हम अपने रिश्तों में कटुता को छोड़ दें। अपने भीतर की सारी बुराइयों पर विजय प्राप्त कर आत्मशुद्धि की ओर बढ़ें।

(मृदुला दुबे योग शिक्षक एवं अध्यात्म की जानकर हैं।)

ये भी पढ़ें :-‘भगवा है अपनी पहचान’: संघ की शताब्दी पर आधारित फिल्म ‘शतक’का एंथम लॉन्च किया मोहन भागवत ने

One thought on “मकर संक्रांति : खगोलीय घटना नहीं बल्कि आत्मीय रिश्तों में क्षमा और नवीन आरंभ का प्रतीक

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *