दारा शुकोह के चरित्र ने पिछले चार शताब्दियों से लेखकों, कवियों, चिंतकों और इतिहासकारों को आकर्षित किया है. पिछली शताब्दी के लगभग अंत में अंग्रेजी अखबार द स्टेट्समैन के एक वरिष्ठ, यशस्वी पत्रकार श्यामल गंगोपाध्याय ने दो खंडों में बांग्ला में उपन्यास लिखा था “दारा शुकोह” उस पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी(बांग्ला )का पुरस्कार भी मिला था.
प्रस्तुत पुस्तक शोधकर्ता,चिंतक डॉ मैनेजर पाण्डे के तीन दशकों के शोध का परिणाम है. दुखद है कि प्रो पांडे की यह शोधपूर्ण पुस्तक उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो सकी. प्रकाशन के पूर्व ही उनका निधन हो गया. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक के प्रकाशक अशोक माहेश्वरी अपने प्रकाशकीय में लिखते हैं कि “…..मान्य आलोचक मैनेजर पाण्डेय के चिंतन और लेखन में भारत की सामासिक संस्कृति हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रही है……….. उन्हें भारत की ‘संगम ‘ – संस्कृति के सूत्रों के अध्ययन-अन्वेषण पर अपना1 ध्यान केंद्रित करना जरूरी लगा.
अपने अंतिम दिनों में वे एकाग्र भाव से इस दिशा में सक्रिय रहे. इसी क्रम में उन्होंने “‘मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता’ शीर्षक से एक महवपूर्ण पुस्तक का संकलन -संपादन किया.लगभग तीन दशक से वे दारा शुकोह के जीवन और लेखन के बारे में शोधरत थे. इस कार्य के दौरान ही दारा शुकोह पर समग्र पुस्तक लिखने की योजना लगभग पूरी की.”
प्रो.मैनेजर पांडेय जी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं : “डॉ. रामविलास शर्मा ने सन 1943 में ‘दारा शिकोह ‘शीर्षक से एक लंबी कविता लिखी थी जिसमें दारा के जीवन,युद्ध और छल-छद्म से भरी पराजय से दारा को को काफिर कहकर उसकी घृणास्पद हत्या का निर्णय लेने और उसे लागू करने का उल्लेख है।
यह पूरी कहानी डॉ. शर्मा की कविता में मौज़ूद है पर साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि ‘किन्तु इतिहास में है दारा का नाम अमर’। ” 191पृष्ठ के इस पुस्तक को लेखक-शोधकर्ता मैनेजर पांडेय ने भूमिका सहित छः खंडों में विभाजित किया है. वे खंड हैं भूमिका, शहीद शहज़ादा,संगम -संस्कृति का साधक, दारा शुकोह का लेखन,संवादधर्मी व्यक्ति और विचारक तथा हिंदी साहित्य ने दारा शुकोह. पुस्तक में विस्तार से बताया गया है कि कैसे दारा ने संस्कृत का अध्ययन कर पौराणिक ग्रंथों का अनुवाद करवाया था.
इस बात को भी स्पष्ट किया गया कि दारा शुकोह की ही विचारधारा की अगली कड़ी थे अमीर खुसरो और बहुत सारे अन्य शायर, विचारक जो भारत की संगम संस्कृति के पैरोकार बने. पुस्तक की छपाई अच्छी है पुस्तक अति पठनीय और संग्रणीय है.
पृष्ठ-191, प्रकाशन वर्ष-2024,
लेखक-मैनेजर पांडेय
प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन , मूल्य-रु 299.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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