मृत्युंजयी : भागवत झा ‘आज़ाद’ के महाकाव्य का लोकार्पण

साहित्यकार एवं प्रखर राजनीतिक विचारक भागवत झा ‘आज़ाद’ के स्मृति दिवस के अवसर पर शुक्रवार को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में उनके महाकाव्य ‘मृत्युंजयी’ का लोकार्पण एवं साहित्यिक विमर्श आयोजित किया गया। समारोह की अध्यक्षता राजनेता जनार्दन द्विवेदी ने की, जबकि मुख्य अतिथि राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी थे। वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता और आशुतोष कुमार ने भी अपने विचार रखे। स्वागत वक्तव्य भागवत झा आजाद के ज्येष्ठ पुत्र राजवर्धन आजाद ने दिया।

भागवत झा ‘आज़ाद’
Written By : डेस्क | Updated on: November 28, 2025 11:50 pm

इस अवसर पर राजनेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि भागवत झा की यात्रा अंतर्द्वंद्व से संकल्प की यात्रा थी। उन्होंने भागवत झा ‘आज़ाद’  के साथ अपने अनेक संस्मरण उद्धृत किए। उन्होंने कहा कि भागवत झा जी स्वतंत्रता सेनानियों की दूसरी पीढ़ी से आते थे और मैं उन्हें उसी पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में देखता हूँ। वे आरंभ से अंत तक एक सच्चे और स्पष्टस्वभाव व्यक्ति थे।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि भागवत झा आजाद को भले ही मैं व्यक्तिगत रूप से देख नहीं सका, पर ‘धर्मयुग’ पढ़ते समय उनकी रचनाओं से जो परिचय बना, उसने हमेशा यह महसूस कराया कि राजनीति में रहते हुए भी वे राजनीति से ऊपर उठकर देश और समाज की गहरी चिंताओं पर विचार करने वाले एक सच्चे चिंतक थे। आजाद जी के जीवन का सार उनके इन शब्दों में सिमटा प्रतीत होता है, ‘सहयोग नहीं, बाधाएं दो; मैं संसार बना लूंगा। मैं नहीं मांगता भीख, मुझे स्वयं बढ़ने दो।’ यह पंक्ति उनके निश्चय, आत्मबल और संघर्षशीलता का प्रमाण है। यही कारण है कि इस ग्रंथ के द्वितीय खंड में उनके जीवन अनुभव, उनके प्रदेश की वेदना और उनकी आंतरिक रोशनी, सभी अत्यंत प्रभावशाली रूप में साकार दिखाई देते हैं.

पत्रकार आलोक मेहता ने कहा कि भागवत झा जी अत्यंत स्पष्टवादी, जुझारू और अडिग व्यक्तित्व वाले थे, जो किसी प्रकार का समझौता नहीं करते थे। उनके योगदान के बारे में नई पीढ़ी को अवश्य बताया जाना चाहिए। मृत्युंजय कविता के माध्यम से उनके व्यक्तित्व के अनेक पक्षों को रेखांकित किया गया। उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि उनके भाषणों का संकलन आधारित एक पुस्तक प्रकाशित की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त मेहता ने उनकी कविता का वाचन किया, जिनमें पाखंड और भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार है, साथ ही जातिवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध सशक्त संदेश भी निहित है।

वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष कुमार ने कहा कि उनकी भारतीय दर्शन और बौद्ध धर्म पर गहरी दृष्टि थी। यदि वे राजनीति में न होते, तो साहित्य के क्षेत्र में अत्यंत ऊँचे स्थान पर होते। इस पुस्तक में बुद्ध की समूची विचार-यात्रा और अष्टांग मार्ग का सुस्पष्ट वर्णन मिलता है। वे मानव मुक्ति के सिद्धांत पर गहनता से विचार करते थे, और यह संपूर्ण चिंतन मृत्युंजय पुस्तक में सन्निहित है।
डॉ. सविता झा ने मृत्युंजय पुस्तक की कविता का अंश-पाठ किया। उन्होंने कहा कि भागवत झा राजनीति में रहते हुए भी मूलतः एक लेखक थे और अंत तक लेखक ही बने रहे। वे साहित्य के माध्यम से राजनीति से संवाद करते थे और अपने लेखन द्वारा राजनीति को निरंतर समृद्ध करते रहते थे। भागवत झा आजाद के तीनों पुत्र डॉ. राजवर्धन आजाद, आइपीएस (रिटा.) यशोवर्धन और क्रिकेट खिलाड़ी एवं सांसद रहे कीर्तिवर्धन आजाद ने अतिथियों का स्वागत किया।

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