सैलानियों के लिए गाइड बुक की तरह है कल्याणी झा’कनक’ की ‘नई दिल्ली से इंडियाना वाया पेरिस’

 किसी ने कहा है कि कोई सैलानी सब से पहले अपनी कल्पनाओं में विचरण करता है .हमारे देश में पहले देशाटन एक तरह से तीर्थाटन का ही पर्याय होता है . पर्यटन का रूप भी वक्त के साथ बदला. अब भी पूरी दुनिया से सैलानी भारत घूमने -देखने आते हैं .मूल रूप से भारतीय बहुत उत्सुक सैलानी नहीं होते. कारण स्पष्ट है आम भारतीय मध्यवर्ग के पास आवश्यक आवश्यकता को पूरे करने के भी आर्थिक साधन नहीं होते पर फिर आप गौर करेंगे तो आम मध्य वर्ग का और निम्न मध्यवर्ग का बंगाल निवासी बहुत जिज्ञासु सैलानी होता है.

पुस्तक के आवरण का अंश
Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: January 28, 2026 11:57 pm

हिंदी प्रदेश के आम लोगों को सिर्फ सैलानी के रूप में यात्रा करने की चर्चा आप कम ही सुनते हैं. प्रौढ़ावस्था के बाद तीर्थाटन की आकांक्षा आम हिंदुओं में होती है. अन्य समुदाय के लोग भी मक्का -मदीना, अजमेर शरीफ,संत फ्रांसिस ज़ेवियर चर्च इत्यादि की यात्रा की योजना बनाते रहते हैं. पिछले लगभग तीन दशकों से हिंदी प्रदेश के लाखों युवक और युवती देश में और विदेशों में रोजगार के लिए जाते रहे हैं. स्वाभाविक है उनके भारतीय माता पिता उनसे मिलने उन देशों की यात्रा करते हैं .इन यात्राओं में बुजुर्गों का एक बड़ा आकर्षण होता है अपने पोते-पोतियों या नाती नतनियों से मिलने और उनके साथ समय गुजारने का. आम बुजुर्ग की तरह कल्याणी झा कनक की यात्रा भी मूल रूप से बच्चों से मिलने की यात्रा है जिसमें यूरोप और अमेरिका के विभिन्न स्थानों का भ्रमण भी शामिल है जो एक बोनस की तरह है.

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में इन दिनों यात्रा वृत्तांत एक लोकप्रिय विधा के रूप में लोकप्रिय हो चली है . ध्यातव्य है कि इन यात्राओं में अपने और अपने परिवार जनों के व्यक्तिगत बातों की चर्चा यात्रा वृत्तांत को उबाऊ बना देती है. जैसे किसी यात्री को लंदन में वैसा ही दोसा और सांभर खाने को मिला जैसा मैसूरु में देवराज अर्स रोड में मिला था और इस बात की चर्चा एक हज़ार शब्दों में की जाय तो यह पाठक के लिये बोझिल हो जाता है…..”नई दिल्ली से इंडियाना वाया पेरिस” कवयित्री, लेखिका कल्याणी झा कनक का पहला यात्रा वृत्तांत है .कवयित्री कल्याणी की भाषा और लिखने का ढंग कविताओं से बिल्कुल अलग है. कल्याणी की भाषा प्रांजल है और अपनी बातों को बहुत सीधे ढंग से रखने का प्रयास किया है. एक सौ चवालीस पन्ने के इस पुस्तक के अंत में लेखिका ने यात्रा के आकर्षक सात पन्ने रंगीन चित्रों का भी समावेश किया है.

कल्याणी ने प्रारंभ में ही इस यात्रा वृत्तांत अपनी प्यारी पोती को समर्पित किया है .उन्होंने इसमें अपनी पोती की प्रशंसा में कुछ पंक्तियाँ भी लिखी हैं. इस पुस्तक को कल्याणी ने दो भागों में बांटा है पहले भाग में कुछ अध्याय को देखें तो आपको अंदाज़ होगा इस पुस्तक के बारे में.ये अध्याय हैं : नई दिल्ली से इंडियाना वाया पेरिस2/शिकागो ट्रिप-मिशिगन झील, विलिस स्काई डेक, लेज़, मिलेनियम पार्क बीन, सी डॉग रिवर एंड लेक आर्किटेक्चर/फॉल सीजन,दुर्गा पूजा,दशहरा/सुपर बाउल2020,नासा इत्यादि. यात्रा वृत्तांत के दूसरे भाग के कुछ अध्याय पर नज़र डालिये .ये कुछ अध्याय हैं: इंडियाना से न्यूयॉर्क बाय रोड/नियाग्रा फ़ॉल्स ,धरती पर इंद्रधनुष इत्यादि . कल्याणी ने इस यात्रा वृत्तांत को जानकारी से भरा है .अक्सर ऐसे वर्णनों में लेखक सूचना से पूर्ण वर्णन के फेर में स्थानीयता को महसूस करने से चूक जाते हैं .बहुत सारी सूचनाएं इन दिनों पुस्तकों में या नेट पर उपलब्ध हैं फिर वर्णन में अधिक सूचनाओं से पठनीयता कम हो जाती है.

लेखिका कल्याणी ने व्यक्तिगत मानवीय अनुभवों को विस्तार देने से परहेज किया अन्यथा यह एक अति पठनीय और आवश्यक पुस्तक हो सकती थी. बहरहाल आगे के सैलानियों के लिए यह पुस्तक एक आवश्यक गाइड बुक की तरह काम करेगी. प्रत्येक चैप्टर में थोड़ा विस्तार देकर उस स्थान,परिवेश और समाज, बनस्पति, फूल, पशु -पक्षी ,हवा -पानी , भोजन-खान -पान से अवगत करवाया जाता तो अधिक आनंददायक होता. भविष्य के सैलानियों के लिए पुस्तक एक आवश्यक साथी है इसलिए पठनीय और संग्रहणीय भी है. पुस्तक का मुखपृष्ठ आकर्षक है, छपाई बहुत ही सुंदर और टिकाऊ अच्छे कागज पर है. प्रूफ की अशुद्धियां न के बराबर हैं.

पुस्तक: “नई दिल्ली से इंडियाना वाया पेरिस“, लेखिका : कल्याणी झा कनक, पृष्ठ: 144, प्रकाशक: बोधि जन संस्करण.मूल्य:रु. 199.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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