सूत्रों के मुताबिक, इस अविश्वास प्रस्ताव पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। संसदीय नियमों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। इस लिहाज से संख्या पूरी मानी जा रही है और प्रस्ताव को औपचारिक रूप से विचार योग्य माना गया है।
हालांकि, अब यह प्रस्ताव तकनीकी खामियों के कारण विवादों में घिर गया है। विभिन्न मीडिया संस्थानों में आई खबरों के अनुसार, नोटिस में वर्ष 2026 की जगह कई स्थानों पर 2025 लिखा गया है। इसके अलावा, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के नाम की वर्तनी में भी त्रुटि होने की बात सामने आई है। संसदीय मामलों से जुड़े जानकारों का कहना है कि प्रस्ताव का प्रारूप पूरी तरह नियमों के अनुरूप न होने पर उसे रद किया जा सकता है या फिर संशोधन के लिए लौटाया जा सकता है।
सत्तापक्ष ने इन खामियों को लेकर विपक्ष पर निशाना साधा है। सत्तारूढ़ दल का कहना है कि संवैधानिक पद से जुड़े गंभीर मामले में भी विपक्ष ने लापरवाही दिखाई है और जल्दबाजी में तैयार किया गया प्रस्ताव संसदीय परंपराओं के अनुरूप नहीं है। सत्तापक्ष का तर्क है कि तकनीकी गलतियों वाला नोटिस स्वीकार करना स्वयं नियमों का उल्लंघन होगा।
वहीं विपक्ष का कहना है कि तकनीकी आपत्तियों को उछालकर मूल मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है। विपक्षी नेताओं का दावा है कि अध्यक्ष की कार्यशैली को लेकर जो सवाल उठाए गए हैं, उन पर बहस से बचने के लिए प्रक्रियागत अड़चनें गिनाई जा रही हैं।
फिलहाल, लोकसभा सचिवालय अविश्वास प्रस्ताव से जुड़ी सभी आपत्तियों की जांच कर रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि प्रस्ताव को तकनीकी आधार पर खारिज किया जाता है या विपक्ष को त्रुटियां सुधारने का अवसर दिया जाता है। यह मामला संसद के भीतर संवैधानिक मर्यादा, प्रक्रिया और राजनीति—तीनों के लिए बड़ी कसौटी बन गया है।
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