अनामिका यूँ तो कई दशकों से प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रही हैं पर ‘ एक अरसे बाद ‘ उनका पहला संग्रह है. इस संग्रह में अनामिका के कई दशकों से लिखी हुई कविताओं के साथ नई कविताओं को भी शामिल किया गया है.
अनामिका की इन कविताओं को पढ़कर एहसास होता है कि इन कविताओं में व्यक्त विचार गंभीर और गहराई लिए हुए हैं. नक्यमतयनक्क्क् छोटी छोटी कविताओं में अनामिका चक्रवर्ती अनु बहुत बड़ी बड़ी बातें कह जाती हैं. संग्रह के प्रारंभ में चर्चित लेखक , समालोचक, पत्रकार प्रियदर्शन ने भूमिका लिखते वक्त शीर्षक दिया “स्वयं को खोजने की कविता”.
प्रियदर्शन ने लिखा है: ‘छत्तीसगढ़ के महेंद्रगढ़ में रहने वाली कवयित्री अनामिका चक्रवर्ती अनु के इस संग्रह की कविताएँ पढ़ते हुए इस विस्फोट और बिजली को अपनी नसों के के बेहद करीब महसूस किया जा सकता है। उनकी कविताओं में प्रेम है,दुख है,जीवन के दूसरे संघर्ष हैं, लेकिन सबसे ज्यादा,और हर जगह मौजूद बिल्कुल केंद्र में स्त्री है। अचानक यह खयाल आता है कि दरअसल इस दौर में लिखी जा रही बहुत सारी कविता स्त्री द्वारा स्वयं को खोजने की कविता भी है। इस क्रम में कई बार वह बनी -बनाई परिभाषाओं की शरण लेती हैं , कई बार उसे अपर्याप्त पाती हैं और कई बार बिल्कुल नई परिभाषा गढ़ती हैं।उसे एहसास है कि स्वयं को खोज रही इस नई स्त्री को सहन करना आसान नहीं है।
वह सवाल पूछती है, बवाल करती है,मरने से इंकार करती है,किसी जिद की तरह बची रहती है। इस स्त्री के प्रति जो अनकहा सामाजिक रोष है,उसे वे कुछ इस तरह लिखती हैं – ‘ औरतें तुम जाकर कहीं/ मर क्यों नहीं जाती हो/ बार बार तुम/कभी चारे की तरह/कभी दूब की तरह/कहीं भी उग क्यों जाती हो/औरतें तुम बड़ी बवाल हो/अजीब सवाल हो/ जी का जंजालत हो/ तुम किसी भी आग में जलकर/कभी लोहा कभी सोना क्यों बार जाती हो?”
160 पृष्ठ के संग्रह ‘ एक अर्से बाद’ में 110 छोटी छोटी कविताएं हैं. अनामिका के इन कविताओं में एक गंभीर विचार व्यक्त है ,एक सवाल है जो वह पाठकों से ,स्वयं से पूछती हैं.
देखिए कविता ,’विवाहिता स्त्री और प्रेम ‘ : ………………………..विवाहित स्त्रियाँ भी अपने प्रेमी का हर दुःख / अपने आँचल में छुपा लेना चाहती हैं / अपनी हर प्रार्थना में करती हैं /उनके सुख की कामना के लिए आचमन / परन्तु ,कुमारी प्रेमिकाओं की तरह/ उनके सपनों की कोई मंजिल नहीं होती /वह अपने सपनों में जीना चाहती है /अपने प्रेमी के साथ एक पूरा जीवन /गाड़ी के दो पहिए की तरह चलता है, उनका प्रेम और उसकी गृहस्थी/ रात के वैराग्य मठ पर नितांत अकेले/वे पति की पीठ पर देखती हैं प्रेमी कचरा/ पाना चाहती हैं प्रेमी की भावनाओं में/अपनेपन की छांव और जीवन की विषमताओं में/ उसकी सरलता का साथ. .. कुंवारी लड़कियां प्रेमी के संग/बंधना चाहती है परिणय सूत्र में….. जबकि ,/विवाहित स्त्रियां प्रेमी को नहीं चाहती खोना/ बंध जाना चाहती हैं विश्वास के अटूट बंधन में … वे विवाहिता होने की ग्लानि में/प्रेम की आहुति नहीं देती/ बल्कि,/। संसार की सारी प्रेमिकाओं की तरह /अपने प्रेमी को/ मन प्राण से करती जाती है प्रेम.”
हिंदी में ऐसी कविताएं प्रायः आपने नहीं पढ़ी होंगी. इन पंक्तियों में प्रेम का वह रुहानी रूप दिख रहा है जहां जिस्मानी प्रेम पीछे छूट जाता है, जहां परंपरा की रक्षा भी दिखाई दे रहा और प्रेम का उत्कर्ष भी.और इसी लिए अनामिका की कविताएं सामान्य प्रेम कविताओं से अलग हैं. संग्रह में जीवन के विभिन्न आयामों को कविताओं में स्थान दिया गया है .कुछ कविताओं के शीर्षक देखिए : प्रेम और कविताएं, माहवारी ,शापमुक्त,जंगल, डूबना, विसर्जन,आत्महत्या अंतिम बिंदु इत्यादि. अनामिका की भाषा सुंदर और शब्द भंडार विशाल है. अनामिका ने तत्सम शब्दों का भी बहुत सुंदर प्रयोग किया है. इनकी कविताओं में कुछ भी अछूत नहीं है, जो कुछ भी जीवन में घटित है उसमें कुछ भी कविता का विषय हो सकता है. अनामिका का प्रथम संग्रह ही बहुत अधिक उम्मीद जगाता है. संग्रह अति पठनीय और संग्रहणीय है।
पूस्तक – एक अरसे बाद (कविता संग्रह), पृष्ठ :160
प्रकाशक- भावना प्रकाशन, मूल्य -400 रुपये

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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