अगस्त्य एक वैदिक ऋषि थे। वे वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई थे। उनका जन्म श्रावण शुक्ल पंचमी को काशी में हुआ था। वर्तमान में वह स्थान ‘अगस्त्यकुंड’ के नाम से प्रसिद्ध है। उनकी पत्नी लोपामुद्रा विदर्भ देश की राजकुमारी थीं। अगस्त्य ऋषि को सप्तर्षियों में से एक माना जाता है।
1. संस्कृति के सेतु – उत्तर से दक्षिण तक
ऋषि अगस्त्य वेदों के प्रमुख प्रचारक माने जाते हैं, जिन्होंने दक्षिण भारत को वैदिक ज्ञान से परिचित कराया। वे तमिल भाषा के आदिगुरु कहे जाते हैं। तमिल परंपरा में उन्हें तमिल व्याकरण के रचयिता के रूप में पूजा जाता है।
“जहाँ भाषा बंटी थी, वहाँ अगस्त्य ने उसे पुल की तरह जोड़ा।”
2. शक्ति का संयम – समुद्र से संवाद
रामायण में वर्णन है कि अगस्त्य ऋषि ने एक ही घूंट में समुद्र पी लिया था, जिससे राक्षसों की सेना नष्ट हो गई। यह चमत्कार नहीं, धर्म की रक्षा के लिए किया गया आत्मबल का प्रयोग था।
मंत्र:
“ॐ अगस्त्याय नमः।”
जो विनम्रता में भी अग्नि की तरह तेजस्वी हो, उसे प्रणाम।
3. गृहस्थ आश्रम में ब्रह्मचर्य का तेज
राजकुमारी लोपामुद्रा से उनका विवाह केवल सांसारिक बंधन नहीं था, बल्कि धर्म और स्त्री-सम्मान का प्रतीक था। लोपामुद्रा को वे विचारों में समान मानते थे — एक सहचिंतक और सहसाधक।
उन्होंने सिद्ध किया कि गृहस्थ भी ब्रह्मऋषि बन सकता है।
4. विज्ञान के प्रथम आचार्य
उनकी रचित “अगस्त्य संहिता” में विद्युत उत्पत्ति, धातुशोधन, और जलविद्युत की प्रक्रिया तक वर्णित है।
मंत्र (संहिता से):
“संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्…”
मिट्टी के पात्र में तांबा और जस्ता स्थापित कर विद्युत उत्पन्न की जा सकती है।
यह आधुनिक विज्ञान से हजारों वर्ष पूर्व की वैज्ञानिक चेतना है।
5. प्राणियों और प्रकृति से संवाद
अगस्त्य ऋषि ने विंध्य पर्वत को झुकने को कहा और वह आज तक झुका हुआ है — क्योंकि ऋषि कभी लौटे ही नहीं।
यह घटना प्रकृति के साथ संवाद, न कि दमन की शिक्षा देती है।
6. राक्षसों का संहार — केवल धर्म के लिए
जब राक्षस वातापी और इल्वल ब्राह्मणों को छल से मारते थे, तो अगस्त्य ने उन्हें नष्ट किया।
तपस्वी की पाचनशक्ति इतनी प्रबल थी कि अधर्म को आत्मसात कर निष्क्रिय कर सके।
7. शक्ति में शांति, तेज में करुणा
ऋषि अगस्त्य में अपार सिद्धियाँ थीं, पर कभी उन्होंने उसका प्रदर्शन नहीं किया। वे सिखाते हैं —
“विनम्रता, शक्ति का सबसे सुंदर आभूषण है।”
8. अगस्त्य का नाम ही दर्शन है
“अगस्त्य” = “अ” (न) + “ग” (गमन) + “स्त्य” (स्थित)
अर्थ: जो गति को रोक कर, स्थिरता ला सके।
वे केवल ऋषि नहीं, गति में स्थित धर्म का स्वरूप थे।
ऋषि अगस्त्य हमें सिखाते हैं कि ज्ञान को सीमाओं में नहीं बाँधना चाहिए,शक्ति को अहंकार से नहीं जोड़ना चाहिए और धर्म केवल पूजा या वनवास नहीं, संतुलित, विनम्र और सेवा से भरा जीवन
है।
ऋषि अगस्त्य का संदेश – आज के युग के लिए:
“तुम विज्ञान से मत डरो — उसे आत्मा से जोड़ो।
तुम परिवार से मत भागो — उसे तपोभूमि बनाओ।
तुम प्राचीन रहकर जड़ मत बनो — वर्तमान में प्रकाश बनो।”

(मृदुला दुबे योग शिक्षक और अध्यात्म की जानकर हैं।)
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