पुस्तक और सोनल मानसिंह की कला यात्रा पर बात करते हुए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने कहा, “सोनल जी का जीवन ‘जिद’ नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास का प्रतीक है। उनकी कला, साधना और संस्कृति सेवा का अद्भुत संगम है। कठिन संघर्षों के बावजूद, विशेषकर गंभीर दुर्घटना के बाद मंच पर उनकी पुनः वापसी “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” की जीवंत मिसाल है।” पूर्व राष्ट्रपति कोविन्द जी ने कहा, “नृत्य केवल तकनीक नहीं है, बल्कि ध्यान, साधना और योग का रूप है।” उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा की प्रासंगिकता पर बल देते हुए मुंडकोपनिषद् के श्लोक “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्” – अर्थात् उस (परब्रह्म) के विज्ञान (वास्तविक ज्ञान) के लिए, हाथ में समिधा (यज्ञ की लकड़ी) धारण करके, वेदों को जानने वाले (श्रोत्रिय) और ब्रह्म में स्थित (ब्रह्मनिष्ठ) गुरु के पास ही जाना चाहिए- का उल्लेख किया। उन्होंने डॉ. सोनल मानसिंह के पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक चेतना से जुड़े प्रयासों की सराहना की, जिन्हें उन्होंने नृत्य के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया।
1970 में स्थापित सेंटर फॉर इंडियन क्लासिकल डांसेस (श्री कामाख्या कला पीठ) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह संस्था 45 वर्षों से उत्कृष्ट नर्तकों को तैयार कर रही है और वंचित बच्चों के लिए भी निःशुल्क कक्षाएं आयोजित कर रही है। अंत में उन्होंने युवा कलाकारों को संदेश देते हुए कहा कि तकनीक अवश्य सीखें, परंतु भाव और परंपरा को न छोड़ें। उन्होंने कहा, सोनल जी ने नृत्य को साधना माना है। उनका जीवन नए कलाकारों के लिए प्रेरणा और एक संदेश है। पुस्तक के शीर्षक पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि ‘ए ज़िगज़ैग माइंड’ बहुत सार्थक शीर्षक है, क्योंकि सफलता की राह सीधी नहीं होती।
सोनल जी संस्कृति को जीती हैं- दत्तात्रेय होसबाले
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने ‘अ जिगजैग माइंड’ के संशोधित संस्करण पर विचार साझा करते हुए कहा कि सोनल जी का जीवन नृत्य तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और अध्यात्म का जीवंत प्रतीक है। उनका नृत्य मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति की गहराई का अनुभव कराता है। भरतनाट्यम और ओडिसी की साधक होने के साथ, वे रामायण, महाभारत, रामचरितमानस और विश्व सभ्यताओं की जानकार हैं तथा मराठी, गुजराती, कन्नड़, संस्कृत और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में दक्ष हैं। उन्होंने कहा कि सोनल जी केवल कला प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि संस्कृति को जीती हैं। स्त्रीत्व पर उनका दृष्टिकोण अद्भुत है और मुंबई में आयोजित ‘फेमिनिन डिविनिटी’ सम्मेलन में उनका संबोधन पूरी दुनिया के प्रतिनिधियों पर गहरी छाप छोड़ गया। पुस्तक के शीर्षक पर उन्होंने कहा कि अनुशासनप्रिय सोनल जी का जीवन ‘जिगजैग’ नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और स्पष्टता का प्रतीक है।
डॉ. सोनल मानसिंह ने बताई ‘ए ज़िगज़ैग माइंड’ पुस्तक के पीछे की कहानी
किताब का नाम ‘ए ज़िगज़ैग माइंड’ कैसे उनके दिमाग में आया, इसके बारे में बताते हुए डॉ. सोनल मानसिंह ने कहा, “आर्टिस्ट की जिद होती है कि बीमार हैं, तब भी हमें कार्यक्रम करना है। पैर दुख रहे हैं, कुछ भी हो, लेकिन कार्यक्रम करना है और ऐसे करना है कि अपना सर्वश्रेष्ठ परफॉरमेंस देना है। ये ज़िद बड़ी काम आती है। 1997 में मैं लैटिन अमेरिका और सेंट्रल अमेरिका के 12 देशों की यात्रा पर थी। मैं माचू पिचू गई, वहां 12 या 14 हज़ार फीट पर मैंने मेयर और 20 लोगों को लेक्चर डिमॉन्सट्रेशन दिया, कुछ मुद्राएं सिखाईं। उसके बाद, ट्रेन जाती है 2000 फीट ऊंचाई पर ज़िगज़ैग, ज़िगज़ैग करते हुए, लेकिन ये आपको गंतव्य तक ले जाती है। यही मुख्य बात है। उसी तरह आपके विचार एक तीर की तरह सीधे न जाकर ज़िगज़ैग की तरह जाते हैं, लेकिन गंतव्य तक पहुंच जाते हैं। आपको और बहुत कुछ देखने को मिलता है और बहुत कुछ सोचने का समय मिलता है।
इस अवसर पर संदीप भूतोड़िया ने कहा, “ये महत्त्वपूर्ण पुस्तक डॉ. सोनल मानसिंह के विशिष्ट कला अनुभवों का मनमोहक संग्रह है। इस पुस्तक में निहित अनुभव पाठकों को अपनी जीवन यात्रा को खूबसूरत बनाने का पथ सुझाने के साथ-साथ, जीवन को समग्रता में देखने, इसके सौंदर्य को निरखने और अनुभूत करना सिखाते हैं।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि इस अवसर का हिस्सा बनना उनके लिए गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि आईजीएनसीए और उसकी पूरी टीम इस उल्लेखनीय पुस्तक का एक और संस्करण प्रकाशित करते हुए अत्यंत गौरवान्वित महसूस कर रही है। यह कृति एक अनुकरणीय कलाकार डॉ. सोनल मानसिंह की प्रेरक यात्रा का वृत्तांत प्रस्तुत करती है। यह उनके जीवन और कलात्मक गतिविधियों का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करती है, सांस्कृतिक मुद्दों को सर्वोपरि रखती है और भारतीय परम्पराओं की समृद्धि को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करती है।
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