तुलसीदास कहते हैं कि संसार में ऐसा कौन तपस्वी, ज्ञानी, शूरवीर, कवि, विद्वान है जिसे लोभ (Greed) ने न जकड़ा हो। हर कोई लोभ के मोह से संकट में पड़ा है। धन के मद ने किसको टेढ़ा और प्रभुता ने किसको बहरा न कर दिया? ऐसा कौन है जिसे मृगनयनी/ स्त्री के नेत्रों से बाण न लगे हों।
लोभी के चरित्र का पतन हो जाता है
लोभी व्यक्ति के चरित्र का पतन हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने स्वाभिमान की परवाह न करते हुए कामना की पूर्ति हेतु गुलाम बन जाता है। लोभी कुछ पाने की आशा में सब कुछ गंवा देता है। जैनमुनि ने कहा कि लोभ वह मोहनीय कर्म है जिसके कारण मनुष्य किसी पदार्थ को त्याग नहीं सकता।
जो कर्म आत्मा को मोहित करके मूढ़ बना देता है उसे जैन मुनि मोहनीय कर्म कहते हैं। लोभ (Greed) का विस्तार आकाश के समान अनंत है यह एक ऐसी मनोवृत्ति है जिसके वशीभूत होकर व्यक्ति पापों के दलदल में पांव रखने के लिए तैयार हो जाता है।
“लोभ पाप का बाप है” उत्तम शौच धर्म डॉक्टर अरविंद प्रेम चंद्र जैन, भोपाल
अज्ञानता के कारण प्राणी “मैं” और “मेरे”, की कल्पना करता हुआ पदार्थों के उपभोग करने में सुख और वियोग में दुख मानता है। मन के चार प्रकार के विकार हैं – क्रोध, लोभ, माया और अहंकार। ये विकार प्राय: सभी प्राणियों में पाए जाते हैं। कर्म बन्धन और संसार में बार- बार आने का यही मुख्य कारण है।
लोभ चेतना के नकारात्मक गुणों में है
क्रोध, लोभ, अहंकार आदि मन या चेतना के नकारात्मक गुण हैं। नकारात्मक गुणों को बुद्ध ने “अग्नि” कहा। इन तीनों गुणों के कारण भव चक्र है। किसी ने बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक सरीपुत्त से एक बार पूछा गया,”निर्वाण क्या है?” उन्होंने उत्तर दिया,” लोभ का नाश, क्रोध का नाश, भ्रम का नाश -यही निर्वाण है।”
लोभी को त्रिलोक की संपत्ति मिलने पर भी संतोष नहीं होता। जैसे-जैसे शरीर को सुख देने वाली वस्तु प्राप्त होती है उसका लोभ बढ़ता ही जाता है। लोभ से ही मैथुन, हिंसा आदि सब पाप करता है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं – सोते समय भी अपने बिस्तर के सिरहाने विवेक की तलवार रहे, ताकि लोभ (Greed) स्वप्न में भी तुम्हारे पास न आ सके। ऐसी शक्ति का अभ्यास करने से धीरे – धीरे त्याग आयेगा, और तब तुम देखोगे कि स्वर्ग के द्वार तुम्हारे लिए खुले हैं।
तीर्थंकर महावीर कहते हैं – लोभ न करने पर ही पुण्यवान को धन की प्राप्ति होती है। इसलिए धन की प्राप्ति में आसक्ति कारण नहीं है, परंतु पुण्य ही कारण है।
मेरे स्वयं के अनुभव
अब मैं अपने छोटे से भी कर्म को बिना लोभ के बहुत ध्यान से करती हूं ताकि वो पाप बनकर मेरे दुख और बन्धन का कारण न हो।
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