उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बरेली (Bareilly) में 2010 में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। तब बसपा (BSP) की सरकार थी और मुख्यमंत्री थीं बहन मायावती (Mayawati)। दंगा हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच था जिसे खबरों की भाषा में दो सम्प्रदायों के बीच का दंगा कहा जाता रहा है। सौहार्द्र बनाए रखने की पहली शर्त इसे ही माना जाता है क्योंकि यदि सम्प्रदायों का उल्लेख साफ-साफ कर दिया गया तो बहुत कुछ आहत हो जाता है। अभी भी यह सिलसिला जारी है। उन दंगों में लगभग 20 दुकानें जला दी गई थीं- पहचान करके।
बरेली में 2010 में हुए उन दंगों का मास्टरमाइंड माना गया इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (IMC) के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा (Maulana Tauqeer Raza) को। जनाब आला हजरत अहमद रजा बरेलवी (Ahmad Raza Barelvi) के वंशज हैं जिन्होंने सुन्नियों के बीच बरेलवी मसलक की शुरुआत की थी। अभी तौकीर रजा फिर चर्चा में हैं। उन्हें उन दंगों का मास्टरमाइंड मानते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट ने तौकार की गिरफ्तारी कर उन्हें अदालत में पेश करने का आदेश जारी किया है। किन्तु उन्हें तलाश नहीं किया जा सका है और कोर्ट ने अपनी नाराजगी जताई है।
तौकीर रजा अपनी विवादित टिप्पणी को लेकर हमेशा चर्चा में रहे हैं। रहना ही पड़ता है। कहीं ऐसा न हो कि लोग उन्हें भूल जाएं या यह मान लें कि कौम की आग नरम हो चली है। यही उनकी या उन जैसे मुसलमान नेताओं व विद्वानों की खूबी रही है। कुछ दिनों पहले उन्होंने उत्तराखंड के हल्द्वानी में अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई का विरोध करते हुए कहा था, “हम अब किसी बुलडोजर को बर्दाश्त नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट अगर संज्ञान नहीं ले रहा है तो हम अपनी हिफाजत खुद करेंगे। हमें कानून ने अधिकार दिया है कि अगर हम पर कोई हमला होता है तो हम उसे जान से मार दें।”
मौलाना तौकीर रजा आला हजरत खानदान के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने राजनीति में कदम रखा है। 2001 में अपनी पॉलिटिकल पार्टी इत्तेहाद-ए-मिल्लत परिषद बनाई थी। अपने पहले ही चुनाव में उनकी पार्टी ने नगरपालिका की 10 सीटें जीती थीं। साल 2009 में रजा कांग्रेस में चले गए। फिर 2012 में समाजवादी पार्टी (SP) का दामन थाम लिया था।
2013 में सपा सरकार ने तौकीर रजा को हथकरघा निगम का उपाध्यक्ष बनाया था जिसे मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उन्होंने छोड़ दिया था। बाद में उन्होंने सपा से भी इस्तीफा दे दिया। इसी बीच उन्होंने अरविंद केजरीवाल से भी दोस्ताना गांठा। फिर 2014 में मायावती के हाथी पर सवार हो गए। यानी पार्टी-पार्टी खेलते हुए उन्होंने सबको इस बात के लिए रिझाने की कोशिश की कि वे साथ रहेंगे तो मुस्लिम वोट मिलेंगे। सभी पार्टी प्रमुख भी रीझते-रिझाते रहे। विवादित बयानों का क्रम टूटा नहीं।
2022 में बरेली में मुसलमानों को संबोधित करते हुए उन्होंने हिंदुओं को कथित तौर पर धमकी दी। उन्होंने कहा था, “मैं अपने हिंदू भाइयों को चेतावनी देना चाहता हूं कि मुझे डर है कि जिस दिन मेरे मुस्लिम युवाओं को कानून हाथ में लेने को मजबूर किया जाएगा, आपको भारत में कहीं भी छिपने की जगह नहीं मिलेगी।”
ज्ञानवापी में कथित शिवलिंग मिलने पर तौकीर रजा ने कहा था कि फव्वारे को शिवलिंग समझकर धर्म और कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा था कि अयोध्या मसले पर सारे झूठ सहन कर लिए गए थे, अब नहीं करेंगे। सरकार हर मस्जिद को मंदिर बनाना चाहती है। ऐसा ही रहा तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। दिल्ली के जहांगीरपुरी में हिंसा के बाद तौकीर रजा ने मोदी सरकार को धृतराष्ट्र बताया था।
ज्ञानवापी में कथित शिवलिंग मिलने पर तौकीर रजा ने कहा था कि फव्वारे को शिवलिंग समझकर धर्म और कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा था कि अयोध्या मसले पर सारे झूठ सहन कर लिए गए थे, अब नहीं करेंगे। सरकार हर मस्जिद को मंदिर बनाना चाहती है। ऐसा ही रहा तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। दिल्ली के जहांगीरपुरी में हिंसा के बाद तौकीर रजा ने मोदी सरकार को धृतराष्ट्र बताया था।
अब समझने लायक बात यह है कि आखिर सरकार द्वारा ऐसे अराजक तत्वों पर कार्रवाई करने की क्या कोई सीमा निर्धारित है? तमाम बयान आपत्तिजनक हैं, इसमें कहीं संदेह तो नहीं है। तो क्या सरकारें पन्थ निरपेक्षता का चोगा ओढ़े ऐसे लोगों का हौसला बढ़ाने में मदद करती हैं? उन्हें यह समझ आ गया है कि सरकार उन पर आसानी से हाथ नहीं डालेगी। अल्पसंख्यकों को दबाने व कुचलने के नाम पर छाती पीटकर विश्व में अपने पीड़ित होने का ऐलान तो वे बड़ी आसानी से कर सकते हैं। वामियों का पूरा तंत्र उनके बौद्धिक समर्थन की अनगिनत मिसालें पेश कर चुका है।
साम्प्रदायिक सौहार्द्र बनाए रखने का सारा भार यति नरसिंहानन्द, जितेन्द्र नारायण सिंह त्यागी, नूपुर शर्मा, काजल हिन्दुस्तानी जैसे लोगों पर है क्योंकि वे अगर हिन्दुओं के पक्ष में बोलेंगे तो न तो भाईचारा बचेगा और न ही संविधान। संविधान बचता है तौकीर रजा जैसे मुसलमान नेताओं के हर जहरीले बयान को सुनकर अनसुना करने से, सबकुछ साफ-साफ दिखने के बावजूद आरोपपत्र में नाम शामिल न करने से।
साम्प्रदायिक सौहार्द्र बनाए रखने का सारा भार यति नरसिंहानन्द, जितेन्द्र नारायण सिंह त्यागी, नूपुर शर्मा, काजल हिन्दुस्तानी जैसे लोगों पर है क्योंकि वे अगर हिन्दुओं के पक्ष में बोलेंगे तो न तो भाईचारा बचेगा और न ही संविधान। संविधान बचता है तौकीर रजा जैसे मुसलमान नेताओं के हर जहरीले बयान को सुनकर अनसुना करने से, सबकुछ साफ-साफ दिखने के बावजूद आरोपपत्र में नाम शामिल न करने से।
साम्प्रदायिक सौहार्द्र बनाए रखने का सारा भार यति नरसिंहानन्द, जितेन्द्र नारायण सिंह त्यागी, नूपुर शर्मा, काजल हिन्दुस्तानी जैसे लोगों पर है क्योंकि वे अगर हिन्दुओं के पक्ष में बोलेंगे तो न तो भाईचारा बचेगा और न ही संविधान। संविधान बचता है तौकीर रजा जैसे मुसलमान नेताओं के हर जहरीले बयान को सुनकर अनसुना करने से, सबकुछ साफ-साफ दिखने के बावजूद आरोपपत्र में नाम शामिल न करने से।
अपराधी को अपराधी कहने, मानने और उस पर उसी आधार पर कार्रवाई करने में हिचक क्यों है चाहे अपराधी किसी भी सम्प्रदाय का क्यों न हो? अपराध बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के चश्मे से तो नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसा नहीं माना जा सकता है कि जिनकी संख्या अधिक है, वही कसूरवार हैं। यह भी नहीं मान सकते हैं कि अल्पसंख्यक है तो अपराधी होगा ही। कानून जब तक राजनेताओं के शिकंजे से और राजनीति जब तक वोटों के शिकंजे से नहीं निकलेगी, राज्य का राष्ट्र बनना संभव नहीं हो पाएगा। यह तो सरकार का दायित्व है कि बात को दूर तक ले जाए।