रामबहादुर राय ने कहा, इस पुस्तक में कुछ खास है। जब आप पुस्तक पढ़ेंगे, तो पाएंगे कि जिन विषयों को लेखक रखना चाहते थे, उन्होंने हर कोण से उसका अध्ययन किया है। भारतीय साहित्य में, भारत के नारी इतिहास में जो 27 जो वंदनीय नाम हैं, वे सब इस पुस्तक में हैं और बहुत विस्तार से हैं। उन्होंने कहा, रामायण और महाभारत में सीता, कैकेयी, द्रौपदी, कुंती, गांधारी से हम परिचित होते हैं। हमारे यहां नारी के प्रति जो अवधारणा रही है, अगर उसको सही तरीके से समझना हो तो दुर्गा सप्तशती के इस अंश को पढ़ना चाहिए – “नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥ त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्यें शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता।।” यानी हमने भारतीय नारी में यह बल देखा है।
“सीता का अस्तित्व हमें याद दिलाता है कि नारी सशक्तिकरण बाहरी परिस्थितियों पर आधारित नहीं होता। वह तो आत्मशक्ति और आत्मज्योति की सतत रक्षा करते रहने की आंतरिक प्रक्रिया है।” श्री रामबहादुर राय ने ‘वीमेन इन द वूम ऑफ टाइम’ के इस अंश को उद्धृत करते हुए कहा कि यह वाक्य अपने आप में इस पुस्तक को बहुत पूर्णता प्रदान करता है। उन्होंने कहा, दरअसल यह पुस्तक एक दृष्टि से पूरा समग्र भारतीय इतिहास है।
डॉ. सोनल मानसिंह ने कहा, हमारी पारम्परिक शब्दावली का अंग्रेजी में अनुवाद करना बहुत कठिन है, क्योंकि अंग्रेजी अक्सर उन शब्दों के पीछे की भावना और गहराई को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती, जो हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं में निहित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इसी प्रकार पुराण के लिए ‘माइथोलॉजी’ शब्द भी उचित नहीं है। ‘पुराण’ का अर्थ है – बहुत प्राचीन घटनाएं, जो सामूहिक स्मृति में संरक्षित हैं। इन्हें काल्पनिक कथा कहना गलत है। इसलिए हमें ‘माइथोलॉजी’ के स्थान पर कोई उपयुक्त शब्द खोजना होगा।
उन्होंने कहा कि एक सुंदर विचार यह है कि समय (काल) की शुरुआत स्त्री के गर्भ से होती है। इसीलिए ‘काली’ समय को नियंत्रित करती हैं। सृष्टि की उत्पत्ति स्त्री से होती है, यह उसकी अद्भुत शक्ति है। मैं यह कहना चाहूंगी कि हमें अपनी प्राचीन परम्पराओं, विशेषकर जनजातीय परम्पराओं को भी समझना चाहिए। ये केवल लोककथाएं नहीं, बल्कि आज भी जीवित परम्पराएं हैं। उन्होंने गुजरात के वाघरी जनजातीय समुदाय की महिषासुर-मर्दिनी से जुड़ी एक कथा बताई, जो सामान्य प्रचलित कथा से बिल्कुल भिन्न है। उन्होंने कहाकि यह कथा शक्ति, सम्बंध और संतुलन के एक अलग दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती है, जो जनजातीय परम्पराओं में आज भी जीवित है।
प्रो. मालाश्री लाल ने कहा, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनेक पुस्तकों में यह धारणा देखी गई है कि नारीवाद पर केवल महिलाएं ही लिख सकती हैं, और वह भी एक पुरुष-विरोधी दृष्टिकोण से। ऐसा नहीं है। दूसरी ओर, जब पुरुष नारीवाद पर लिखते हैं तो उन पर पक्षपात का संदेह किया जाता है, जो गलत है। मुकुल कुमार की यह पुस्तक सिद्ध करती है कि एक पुरुष विद्वान भी संतुलित, स्पष्ट, गहन शोधयुक्त और ईमानदार दृष्टिकोण से नारीवाद को समझ सकता है।
लेखक मुकुल कुमार ने कहा, मैं आपसे इस पुस्तक की यात्रा साझा करना चाहता हूं, यह पुस्तक वास्तव में कैसे जन्मी और यह विचार कैसे उत्पन्न हुआ। नारीवाद (फेमिनिज्म) या स्त्रीत्व (फेमिनिटी) आज के समय की एक ऐसी सामाजिक परिघटना है, जो लगभग हर संवेदनशील व्यक्ति को प्रभावित करती है। यह हमारे देश में आज सबसे महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय प्रवृत्तियों में से एक है। मेरे भीतर इतिहास-बोध से जुड़ा एक प्रश्न बार-बार उठता था, आख़िर नारीवाद ही क्यों? पुरुषवाद क्यों नहीं? मैं यह समझना चाहता था कि यह विचार वास्तव में आया कहां से? उन्होंने कहा कि इसी का परिणाम है ये पुस्तक।
प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने वक्ताओं और अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मुकुल कुमार ने एक अनूठे विषय पर पुस्तक लिखी है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में कौटिल्य के अर्थशास्त्र के कई उद्धरण हैं, जिससे पता चलता है कि आज जो कार्यस्थल पर स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर कानून और दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं, उसको लेकर भारत में कई शताब्दी पूर्व विचार किया जा चुका है। यह विस्मित करने वाली जानकारी है। इस नैरेटिव के पक्ष में पुस्तक में कई साक्ष्य भी दिए गए हैं।
स्त्री विमर्श पर बात करते हुए प्रो. सविता रॉय ने कहा कि भारतीय परम्परा में स्त्री और पुरुष को समान दृष्टि से देखा गया है। इसलिए हमें अपनी जड़ों की ओर, संस्कृति की ओर लौटना चाहिए।
पुस्तक के बारे में
यह पुस्तक भारतीय नारीवाद को एक संभावित दार्शनिक विषय के रूप में स्थापित करने के प्रश्न की पड़ताल करती है। भारतीय इतिहास और ग्रंथों में विभिन्न कालों और स्थानों पर महिलाओं द्वारा प्रदर्शित ऐतिहासिक सक्रियता के अनेक उदाहरण मिलते हैं। अर्थशास्त्र और कामसूत्र जैसे ग्रंथों में महिलाओं की स्थिति पर भी विचार किया गया है। बौद्ध धर्म जैसी भारत की वैकल्पिक सामाजिक और धार्मिक परम्पराओं में भी महिलाओं की महत्वपूर्ण उपस्थिति रही है। लेखक ने इन सभी पहलुओं को सराहनीय ढंग से प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में भारतीय इतिहास के नारीवादी पक्ष को एक समस्या के रूप में उठाया गया है, जो पाठकों को अंतरराष्ट्रीय समयिक और भौगोलिक संदर्भों में नारीवाद पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करेगी। यह पुस्तक प्राचीन भारतीय परम्परा में नारी के स्वरूप और विमर्श को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जो समकालीन संदर्भों में भी अत्यंत प्रासंगिक है।
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