भारत से रिश्ते सुधारने के लिए अमेरिका ने टैरिफ 25 से घटाकर 18% किया

अमेरिका ने अपनी सख्त व्यापार नीति में अहम बदलाव करते हुए कई आयातित वस्तुओं पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का अंतिम फैसला किया है।

Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: February 3, 2026 12:21 am

व्हाइट हाउस की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक यह निर्णय वैश्विक व्यापार दबाव, घरेलू महंगाई और उद्योगों की बढ़ती लागत को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका के रुख में ये बदलाव भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच हुए मदर्स ऑफ ऑल डील्स के एक हफ्ते के अंदर आया है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत पर दबाव बनाने की अमेरिकी रणनीति नाकाम होने के बाद अमेरिका ने ये कदम उठाया है।

अमेरिकी प्रशासन ने माना है कि ऊँचे टैरिफ के कारण न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो रहा था, बल्कि इसका बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी पड़ रहा था। इसी समीक्षा के बाद टैरिफ में यह कटौती लागू की गई।

भारत पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि अमेरिका ने रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखने के कारण भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। यह कदम यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के संदर्भ में उठाया गया था। अमेरिका का आरोप था कि रूसी तेल की खरीद से रूस की अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष समर्थन मिल रहा है। भारत ने उस समय स्पष्ट किया था कि उसकी ऊर्जा खरीद नीति राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और किफायती आपूर्ति पर आधारित है और वह किसी भी देश के दबाव में निर्णय नहीं ले सकता।

अब 25 से घटाकर 18% टैरिफ किए जाने को अमेरिका के बदले हुए रुख के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में नरमी और व्यावहारिकता की ओर संकेत करता है। टैरिफ में इस कटौती से भारतीय निर्यातकों, खासकर स्टील, एल्यूमिनियम, इंजीनियरिंग गुड्स और औद्योगिक उत्पादों से जुड़े सेक्टर को आंशिक राहत मिलने की उम्मीद है।

वैश्विक व्यापार पर असर

जानकारों के अनुसार यह कदम केवल भारत ही नहीं, बल्कि अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी सकारात्मक संकेत है। इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला को स्थिर करने और व्यापारिक तनाव कम करने में मदद मिल सकती है। अमेरिका द्वारा टैरिफ को 25 से घटाकर 18% करना यह दर्शाता है कि वैश्विक दबाव और आर्थिक यथार्थ के आगे वाशिंगटन अब ज्यादा संतुलित और लचीला रुख अपनाने को मजबूर हो रहा है।

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