ग़ज़ल की शुरुआत के बारे में लोगों की अलग अलग राय रही है. हिंदी में बहुत दिनों तक दोहे लिखे जाते रहे ,सखियां लिखी जाती रहीं. उर्दू में फारसी के बाद ग़ज़लों की दीर्घ परम्परा रही और हिंदी भाषियों के बीच में उर्दू से अनुदित ग़ज़ल खूब लोकप्रिय होते रहे .प्यार- मुहब्बत की बात कहने के लिए या प्यार के खोने की व्यथा व्यक्त करने के लिए ग़ज़ल युवाओं के बीच और प्रौढ़ों के बीच खूब लोकप्रिय होता गया.
ये अलग बात है कि उर्दू में इश्किया ग़ज़लों की तरह ही नातिया ग़ज़ल भी लिखे जाते रहे. सूफी कलामों वाले ग़ज़ल में ईश्वर को एक प्रेमी मानकर उनसे अपने लगाव का सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया जाता पर यह सब उर्दू में था. कश्मीरी में आज भी नातिया ग़ज़ल लिखने की परम्परा है और ऐसे लिखने वाले शायर समाज में विशेष सम्मान के पात्र होते हैं. हिंदी में उपरोक्त अभिव्यक्तियों की कमी को दूर करने के लिए ग़ज़ल लिखने की शुरुआत हुई.
दुष्यंत कुमार ने इसकी शुरुआत की और उनके प्रथम ग़ज़ल संग्रह “साये में धूप” को ही लोगों ने हाथों हाथ लिया. उर्दू ग़ज़ल से बिल्कुल अलग हिंदी ग़ज़ल में उन्होंने ग़ज़ल के विषय चयन में कोई सीमा नहीं रखी. ग़ज़ल में सिर्फ उर्दू के शब्दों की जगह हिंदी के सामान्य और तत्सम शब्दों को स्थान मिलने लगा .स्वाभाविक है बिना किसी उर्दू हिंदी शब्दकोश की सहायता के लोग ग़ज़ल का आनंद लेने लगे .ग़ज़ल समझने के लिए आलिम फ़ाज़िल के फेरे लगाने से भी मुक्ति मिली. हां ग़ज़ल लिखते समय उसके कुछ मूल प्रारूप का ध्यान जरूर रखा जाता है. पेशे से हिंदी के प्राध्यापक बनारस निवासी विनय मिश्र जी दुष्यंत कुमार की परंपरा के ही ग़ज़लकार हैं. इनके कई संग्रह प्रकाशित हैं .इनकी ग़ज़लों के विषय में जीवन से लिये गए हैं .
वर्तमान संग्रह “रंग बारिश” विनय मिश्र जी का नवीनतम संग्रह है. इन्होंने पुस्तक के प्रारम्भ में ही ‘समर्पण’ में लिखा है “नई पीढ़ी को /जो जानती है कि /आज ग़ज़ल हिंदी कविता का /प्रतिनिधि काव्य रूप है।” 120 पृष्ठ के इस पुस्तक में भी 110 ग़ज़ल संगृहीत हैं. कुछ ग़ज़ल के शीर्षक देखिये :1.रोशनी सी बिखर रही थी रात 2.ज़रा सी उमीदें ज़िंदगी में 3.पूछना क्या है मैं कैसा हूँ 4 घर के भीतर का बाज़ार इत्यादि . एक ग़ज़ल की पंक्तियाँ देखिये: ‘कभी वो सामने आए तो पल भर मैं जिसकी याद में रहता हूँ अक्सर ‘ विनय जी की भाषा सुंदर, परिष्कृत और समृद्ध है. इनका शब्द भंडार विपुल है और इन्होंने सायास शब्दों को घुसेड़ने से पूरा परहेज़ किया है . पुस्तक की छपाई साफ, सुंदर कागज़ पर है तथा हार्ड बाउंड है. विनय मिश्र जी का यह संग्रह पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है .ऐसा अवश्य लगता है कि ग़ज़लकार ने सायास कुछ और ग़ज़लों को इस संग्रह में संकलित करने से परहेज़ किया है.
पुस्तक:रंग बारिश ग़ज़लकार:विनय मिश्र पृष्ठ:120
प्रकाशन वर्ष-2025. प्रकाशक : लिटिल बर्ड पब्लिकेशन मूल्य :रु.395.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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