SC/ST Reservation पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 2004 का निर्णय रद

SC/ST Reservation : सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के बारे में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कोटा के अंदर सब कोटा के प्रावधान को मंजूरी दी है। कोर्ट ने कहा है कि एससी/एसटी के लिए सब कैटेगरी बनाई जा सकती है।

SC ST को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
Written By : दीक्षा शर्मा | Updated on: August 1, 2024 3:22 pm

SC/ST Reservation : सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ज्यादा जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए (Scheduled Cast/Scheduled Tribes) यानि  SC/ ST श्रेणी के भीतर विशेष समूह बनाने का फैसला सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि इससे यह सुनिश्चित होगा कि जिन लोगों को वास्तव में मदद की ज़रूरत है, उन्हें मदद मिल सकेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोटे के अंदर कोटा निर्धारित करना असमानता के खिलाफ नहीं है। यह फैसला सभी पक्षों को सुनने के बाद सात न्यायाधीशों के पीठ ने लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के फैसले को किया खारिज़

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोटा के अंदर SC/ ST के लिए सब कैटेगरी को तर्कसंगत आधार पर बनाया जाएगा। उसके लिए मानक भी तय होंगे। राज्य अपनी मर्जी से सब कैटेगरी के लिए रिजर्वेशन तय नहीं कर सकेंगे। सभी राज्यों के कार्य न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत होंगे। कोर्ट ने 2004 में ईवी चिन्नैया मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की खंडपीठ के निर्णय को पलट दिया है। 2004 में कोटे के अंदर सब कैटेगरी को तर्कसंगत नहीं बताया था।

100 प्रतिशत आरक्षण नहीं दे सकेंगे राज्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही उन्होंने SC /ST जैसे विशेष समूहों को अपनी अलग श्रेणियां रखने की अनुमति दी हो, लेकिन राज्य अपनी मनमानी नहीं कर सकते। राज्यों को सब कैटेगरी के लिए 100 फीसदी आरक्षण देने की छूट नहीं होगी। इसके साथ ही राज्यों को सब कैटेगरी के तहत क्यों कोटा दिया जा रहा है, इसका भी स्पष्टीकरण देना होगा।

SC/ST Reservation पर मुख्य न्यायाधीश ने  क्या कहा?

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि 7 न्यायाधीशों में से केवल न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी इस निर्णय से असहमत थीं। अधिकांश न्यायाधीशों ने पिछले निर्णय को खारिज कर दिया और इस बात पर सहमत हुए कि एससी/एसटी जैसी आरक्षित श्रेणियों को छोटे समूहों में विभाजित करना ठीक है। सुप्रीम कोर्ट ने 6:1 बहुमत से फैसला सुनाया कि इन श्रेणियों के उप-वर्गीकरण की अनुमति दी जाती है। सीजेआई ने अपने फैसले में ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जातियां एक समरूप वर्ग नहीं हैं। उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता है और न ही संविधान के अनुच्छेद 341(2) का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 15 और 16 में ऐसा कुछ भी नहीं है जो राज्य को किसी जाति को उप-वर्गीकृत करने से रोकता हो।

जस्टिस गवई ने क्या कहा ?

जस्टिस बीआर गवई ने कहा है कि एससी/एसटी के अंतर्गत ऐसी श्रेणियां हैं जिन्हें वर्षों से उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है। राज्यों को एससी और एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर की पहचान और उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करने के लिए कोई ठोस नीति बनानी चाहिए। यदि ऐसा संभव हुआ तो हर राज्य में सभी जरूरतमंद को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा।

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