Deprived in Hindi Cinema
हिन्दी की पहली सवाक फि़ल्म ‘आलमआरा’ सन् 1931 में प्रदर्शित की गई और इसके पाँच वर्ष के भीतर ही सन् 1936 में निर्देशक फ्रैंज ऑस्टेन ‘अछूत कन्या’ नामक हिन्दी की प्रथम दलित चेतना पर आधारित फि़ल्म लेकर आ गए।
बोधिसत्व डाॅ. बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के दलित जागरूकता आन्दोलन से प्रभावित होकर ही सम्भवतः यह फि़ल्म बनाई गई थी। देविका रानी ने इस फि़ल्म में दलित कन्या की भूमिका को साकार किया था। आज भी यह फि़ल्म हिन्दी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है।
हिन्दी सिनेमा की एक विशेषता यह रही है कि इसमें समाज के सभी वर्गों की वाणी को स्वर दिया गया है। धार्मिक फि़ल्मों से प्रारम्भ हुई यह परम्परा इतिहास से होते हुए समाज तक पहुँची है। समाज में आते ही इसने समाज के अन्तिम पायदान पर खड़े हुए समाज के दर्द को महसूसना शुरू कर दिया और रुपहले चित्रपट पर उसकी वेदना के चित्र उकेरने प्रारम्भ कर दिए।
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‘अछूत कन्या’ के प्रदर्शित होने के बाद अगले साल ही निर्देशक मोती बी. गिडवानी फि़ल्म ‘किसान कन्या’ लेकर आ गए, जिसमें एक किसान की पुत्री के जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों को चित्रित किया गया था। पद्मा देवी और जिल्लो द्वारा इस फि़ल्म में मुख्य भूमिका अदा की गई थी। इतिहास में इस फि़ल्म का इस दृष्टि से भी महत्त्व है कि यह फि़ल्म भारत में बनी पहली रंगीन भारतीय फि़ल्म थी। सन् 1951 में आई राज कपूर की ‘आवारा’ ने आवारा बेरोजगारों की असहायता को चित्रित किया था। यह फि़ल्म देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी अत्यधिक सफल रही। इस फि़ल्म के गीत ‘आवारा हूँ’ को विदेशों में आज भी लोग गुनगुनाते हैं।
वंचित समाज के चित्रण की दृष्टि से वर्ष 1953 अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस वर्ष हिन्दी सिनेमा की दो अमर फि़ल्में ‘आह’ और ‘दो बीघा जमीन’ प्रदर्शित हुईं। इन दोनों फिल्मों में क्रमशः राज कपूर एवं बलराज साहनी ने अपने बेजोड़ अभिनय से वंचितों की वेदना को साकार कर दिया था। ‘आह’ फि़ल्म में राज कपूर ने जीवन के अंधेरे को बड़ी ही कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त किया था। ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी ने कृषक जीवन की निरीहता को जीवंत किया था।
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सन् 1954 में डेविड, रतन और बेबी नाज़ के अभिनय से सुसज्जित ‘बूटपाॅलिश’ फि़ल्म में जूते-चप्पल पाॅलिश करके जीवनयापन करने वाले अनाथ बच्चों की जि़न्दगी का निरूपण किया गया था। सन् 1956 में राजकपूर की ‘जागते रहो’, वी. शांताराम की ‘दो आँखें बारह हाथ’ तथा ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘मदर इण्डिया’ प्रदर्शित हुईं। ‘जागते रहो’ नगरीय जीवन की संवेदनहीनता को उजागर करती थी, ‘दो आँखें बारह हाथ’ खूंखार डाकुओं के आत्मसमर्पण पर आधारित थी, तो ‘मदर इण्डिया’ फि़ल्म गाँव के भोले-भाले किसान परिवार पर साहूकार द्वारा किए जाने वाले अमानवीय अत्याचारों पर आधारित थी।
‘जागते रहो में राज कपूर, मोतीलाल और नर्गिस ने अविस्मरणीय अभिनय किया था, वहीं ‘दो आँखें बारह हाथ’ में वी.शांताराम तथा संध्या ने अपने अभिनय से लोगों का दिल जीत लिया था। ‘मदर इण्डिया’ में राजकुमार, नर्गिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और कन्हैयालाल ने प्रभावशाली अभिनय किया था। यह फि़ल्म भारत से ऑस्कर हेतु नामांकित होने वाली पहली फि़ल्म थी। सन 1957 में ‘प्यासा’ तथा सन 1959 में ‘कागज के फूल’ फि़ल्म से गुरुदत्त ने हिन्दी सिनेमा मेें नयी चेतना का संचार किया।
सन् 1968 में ‘मेरा नाम जोकर’ फि़ल्म में भोले-भाले सर्कसवासियों के जीवन के अभावों तथा निरीहता को वाणी दी गई थी। इसके पश्चात सन् 1973 में आई ‘जंजीर’ फि़ल्म ने अभावों से ग्रस्त युवा के आक्रोश को बड़े परदे पर लाने का काम किया। अमिताभ बच्चन ने इस फि़ल्म से जो अपना फि़ल्मी सफर शुरू किया, वह आज भी जारी है। अगले वर्ष सन् 1974 में मनोज कुमार की ‘रोटी, कपड़ा और मकान’, श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ तथा एम.एस. सत्थू की ‘गरम हवा’ प्रदर्शित हुईं। ये सभी फि़ल्में दीन-हीनों के अभावों तथा समस्याओं की सार्थक अभिव्यक्ति थीं।
सन् 1975 में प्रदर्शित फि़ल्म ‘शोले’ में बेरोजगारी का चित्रण किया गया था। इस फि़ल्म के मौसी तथा बीरू के बेरोज़गारी से सम्बन्धित संवादों को लोग आज भी दोहराया करते हैं। सन् 1978 में ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फि़ल्म अनाथ बच्चे के जीवन के आस-पास घूमती थी। सन् 1981 में आई ‘लावारिस’ फि़ल्म भी इसी विषय पर आधारित थी। अमिताभ बच्चन ने इन दोनों फिल्मों में अविस्मरणीय अभिनय किया था।
इसी वर्ष आई ‘चक्र’ फि़ल्म को स्मिता पाटिल एवं नसीरूद्दीन शाह के अमर अभिनय के कारण लोग आज भी याद करते हैं। सन् 1982 में प्रकाश मेहरा निर्देशित तथा अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘कुली’ फि़ल्म में रेलवे स्टेशनों पर काम करने वाले कुलियों के जीवन को सेल्युलाइड पर पहली बार उतारा गया था।
सन् 1983 में ‘रुदाली’ फि़ल्म में गाँवों में रोने का धंधा करके जीवन-यापन करने की परंपरा का निर्वहन करने वाली स्त्री की कारुणिक कथा को डिंपल कपाडि़या ने अपने जीवंत अभिनय से साकार किया था। इसके बाद सन् 1985 में आई प्रकाश झा की फि़ल्म ‘दामुल’ में भी ग्राम जीवन की निरुपायता व्यंजित हुई है। सन् 1986 में आई एन. चन्द्रा की ‘तेज़ाब’ फि़ल्म में बेरोजगारी और निर्धनता के दुष्परिणाम दिखाए गए हैं। सन् 1993 में आई ‘गर्दिश’ भी इसी विषय के इर्द-गिर्द घूमती थी।
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1998 की आमिर खान अभिनीत ‘गुलाम’ तथा 1999 की संजय दत्त अभिनीत ‘वास्तव’ फि़ल्में बेरोज़गारी की कोख से पैदा हुए अपराधियों के जीवन की मार्मिक अभिव्यक्ति थीं। सन् 2001 में आई आशुतोष गोवारीकर निर्देशित फि़ल्म ‘लगान’ किसानों की अंग्रेज़ राज में हुई दुर्दशा को बयान करती थी। इसके बाद सन् 2005 में आई फि़ल्म ‘बंटी और बबली’ बेरोजगारी से जूझते राकेश के बंटी चालबाज में परिवर्तित होने की कहानी है। ‘ब्लैक’ (2005), ‘पा’ (2010) और ‘गुजारिश’ (2010) फि़ल्में बीमारी से जूझते लोगों की करूण कथाएँ सुनाती थीं।
2007 की फि़ल्म ‘तारे ज़मीं पर’ पढ़ाई से जी चुराने वाले मंदबुद्धि बालक के जीवन का चित्रण करती थी। बेंडिट क्वीन (1988) ‘ओमकारा’ (2006) तथा ‘आरक्षण’ (2011) आदि अनेक फि़ल्मों में दलितों तथा सामंतवादी मानसिकता के लोगों के बीच संघर्ष को चित्रित किया गया है। ‘स्लमडाॅग मिलिनेयर’ (2009) एक बालक के स्लम से उठकर करोड़पति बनने की कहानी थी। 01 नवम्बर 2011 को प्रसारित कौन बनेगा करोड़पति के एपिसोड में बिहार के अतिनिर्धन सुशील कुमार के पाँच करोड़ रुपए जीत जाने से ऐसा प्रतीत होता है कि स्लमडाॅग मिलिनेयर की सेल्युलाइड की कहानी ही सचमुच यथार्थ में परिवर्तित हो गई है।
वर्ष 2012 में प्रदर्शित शूद्र : द राइजिंग’ फिल्म ने जातीय विभेद की भयावह तस्वीर हमारे सामने रखने का काम किया। 2017 में आई फ़िल्म ‘ सीक्रेट सुपरस्टार’ ने यह बताया कि अभावों तथा सामाजिक बंधनों के बावजूद भारत की बहादुर बेटी अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल कर सकती है। साल 2019 में आई ‘सांड की आंख’ फिल्म ने यह साबित किया कि सफलता प्राप्त करने के लिए उम्र और सामाजिक रूढ़ियां बाधक नहीं होतीं, बशर्ते व्यक्ति में कभी हार न मानने का जज़्बा और दृढ़ इच्छा शक्ति हो।
साल 2021 में प्रदर्शित ‘कागज़’ फिल्म ज़िंदा व्यक्ति को सरकारी कागज़ों पर मृत घोषित करने के बाद उस व्यक्ति के सामने आने वाली दुश्वारियों की चर्चा करती है। साल 2022 में विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म ने सन 1989 में कश्मीर में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को लोमहर्षक तरीके से चित्रित कर इस दुखद घटना को सामने रखने का काम किया। साल 2024 में प्रदर्शित ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ और अभी हाल ही में सनोज मिश्रा निर्देशित रिलीज हुई फिल्म ‘द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल’ पश्चिम बंगाल में मानवाधिकारों की दुर्दशा को सामने लाने का काम बखूबी करती है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि हिन्दी सिनेमा में वंचितों को पर्याप्त स्पेस दिया गया है और इन फिल्मों ने समाज के हाशिए पर पड़े समाज को सिनेमाई चाकचिक्य की दुनिया में उनका वास्तविक स्थान दिलाया है।

(प्रो. पुनीत बिसारिया बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में हिंदी के प्रोफेसर हैं और फिल्मों पर लिखने के लिए जाने जाते हैं। वे द फिल्म फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं तथा गोल्डेन पीकॉक इंटरनेशनल फिल्म प्रोडक्शंस एलएलपी के नाम के फिल्म प्रोडक्शन हाउस के सीईओ हैं।)
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