कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे केन्द्रीय पंचायती राज मंत्रालय के संयुक्त सचिव राजेश कुमार सिंह, जबकि विशिष्ट अतिथि थे केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के उप सचिव डॉ. शाह फैसल। कार्यक्रम की अध्यक्षता की आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने और स्वागत भाषण दिया कला निधि प्रभाग के प्रमुख एवं एनएमसीएम के प्रभारी प्रो. (डॉ.) आर. सी. गौड़ ने। इस अवसर पर एनएमसीएम के निदेशक डॉ. मयंक शेखर भी उपस्थित थे।
अध्यक्षीय सम्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, मकर संक्रान्ति पर्व पूरे देश भर में मनाया जाता है। अलग अलग नाम से मनाया जाता है। कहीं बिहू होता है, कहीं पोंगल होता है, कहीं संक्रांति होता है, कहीं उत्तरायण होता है। यह पर्व अलग-अलग तरह से मनाया जाता है, उसके बावजूद एक ही समय पर पूरा देश इस पर्व को मनाता है। इस त्योहार को मनाने की परंपरा अलग अलग प्रदेशों में, अलग अलग क्षेत्रों में कैसी है? वहां खानपान कैसा है, वहां वेशभूषा कैसी है? वहां कौन कौन से रिचुअल्स हैं? कौन कौन सी परम्पराएं हैं, इन सबका भी एक डॉक्यूमेंटेशन हो सकता है। उन्होंने नेशनल मिशन फॉर कल्चरल मैपिंग प्रभाग से आग्रह किया कि जब अगले साल अपना वार्षिक उत्सव मनाएं तो संक्रान्ति के ऊपर एक पब्लिकेशन लेकर आएं कि पूरे भारत में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग जगह पर कैसे मनाया जाता है।
उन्होंने एनएमसीएम की चुनौतियों और उपलब्धियों के बारे में बताते हुए कहा, जब शुरू में यह काम हमको दिया गया था, तो अपने आप में यह बहुत बड़ी चुनौती थी। 6 लाख 50 हज़ार गांवों का डॉक्यूमेंटेशन करना कोई बहुत आसान बात नहीं होती। लेकिन जिस तरह से एनएमसीएम ने काम शुरू किया, यहां के सब लोगों ने मेहनत की, अलग-अलग एजेंसियों का सहयोग मिला है, उसके परिणास्वरूप आज हम 6 लाख 23 हज़ार गांवों का डॉक्यूमेंटेशन कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि बढ़ते शहरीकरण के बीच आज हमें गांव बहुत याद आते हैं, जहां पर आज भी हमारी परम्परा, हमारी सांस्कृतिक थाती कहीं न कहीं मौजूद है। अगर हम उन गांव को बचाकर रखते हैं, तो निश्चित तौर पर ऐसे समय में एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक जागरण करते हैं।
मुख्य अतिथि राजेश सिंह ने कहा कि गांवों की जो कल्चरल मैपिंग हो रही है, वह सरकार की बहुत महत्त्वाकांक्षी परियोजना है और यह बहुत आवश्यक भी है। उन्होंने कहा, जो व्यक्ति गांव को देखना चाहता है, अपनी धरोहर को समझना चाहता है, उसको अगर एक ही जगह प्रामाणिक सूचना मिल जाए, तो उसके लिए इससे बड़ी सुविधा कुछ और नहीं हो सकती। जब हम अपनी विरासत के बारे में जानेंगे, तभी उस पर चर्चा कर पाएंगे और गर्व कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि पंचायतों के लिए संविधान में 29 कार्य निर्दिष्ट हैं और सांस्कृतिक कार्यकलाप भी उनमें एक है। उस पर किसी का ध्यान नहीं गया था। इसी को ध्यान में रखते हुए पंचायती राज मंत्रालय ने ‘पंचायत धरोहर’ का कार्यक्रम शुरू किया।
विशिष्ट अतिथि शाह फैसल ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप लिखित संहिताओं (कोडिफिकेशन) से नहीं, बल्कि श्रुति-स्मृति परम्परा और मौखिक इतिहास के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। ऐसे में जब इस जीवंत संस्कृति का दस्तावेज़ीकरण किया जाता है, तो उसके साथ कई चुनौतियां भी जुड़ जाती हैं। अन्य सभ्यताओं, जैसे कुछ मध्य-पूर्वी या यूरोपीय संस्कृतियों में लिखित ग्रंथों को सर्वोच्च महत्व मिला है, जिससे वहां परिवर्तन की संभावनाएं सीमित हो गईं। इसके विपरीत, भारतीय संस्कृति लचीली और निरंतर विकसित होने वाली रही है।
उन्होंने कहा कि यदि दस्तावेज़ीकरण में गलतियां, अधूरी जानकारियां या प्रमाणीकरण की चूक होती है, तो वह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं रह जाती, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत के साथ अन्याय बन जाती है। इसलिए प्रामाणिकता और सत्यनिष्ठा इस पूरे अभ्यास की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो. रमेश गौड़ ने कहा कि भारत त्योहारों का देश है। सूर्य के उत्तरायण होने पर देश में मकर संक्रान्ति, बिहू, पोंगल मनाए जाते हैं। एनएमसीए की शुरुआत भी मकर संक्रान्ति के दिन 2021 में हुई। केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय ने नोडल एजेंसी के रूप में आईजीएनसीए को एनएमसीएम की ज़िम्मेदारी दी। वहीं डॉ. मयंक शेखर ने विभाग की वार्षिक रिपोर्ट पेश की और उपलब्धियों के बारे में बताया। उन्होंने ‘मेरा गांव मेरी धरोहर’ पोर्टल के बारे में भी कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।
कार्यक्रम की शुरुआत दक्षिण भारतीय पारम्परिक वाद्य-संगीत ‘पंचवाद्यम’ की सशक्त प्रस्तुति से हुई, जिसने वातावरण को मंगलमय बना दिया। इसी क्रम में एनएमसीएम के ब्रोशर और अर्धवार्षिक प्रकाशन ‘माटी’ के द्वितीय अंक का विमोचन भी किया गया, जिसे सांस्कृतिक शोध और जन-संपर्क की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के अंतर्गत नागा जनजाति ‘आओ’ द्वारा पारम्परिक नृत्य-संगीत की मनोहारी प्रस्तुति ने दर्शकों को पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया। इसके बाद प्रज्ञा आर्ट्स की प्रस्तुति तथा श्री नितीश कुमार के सांगीतिक कार्यक्रम ने समारोह को जीवंत बना दिया।
कार्यक्रम के समापन सत्र में रंगोली प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए गए तथा सभी कलाकारों का सम्मान किया गया। धन्यवाद ज्ञापन के साथ औपचारिक कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात् सभी अतिथियों एवं आगंतुकों ने मकर संन्क्रान्ति के विशेष भोजन चूड़ा-दही का आनंद भी लिया। एनएमसीएम का यह प्रतिष्ठा दिवस न केवल मकर संक्रान्ति की सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा रहा, बल्कि भारत की विविध लोक, जनजातीय और शास्त्रीय परम्पराओं को एक मंच पर लाकर राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता का सशक्त संदेश भी देता हुआ सम्पन्न हुआ।
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