यह बातें मंगलवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयन्ती-समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि हिन्दी भाषा और साहित्य के उन्नयन और प्रचार में डॉ मुरलीधर श्रीवास्तव ‘शेखर’ जी का अवदान अतुल्य और नमनीय है। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। विषय चाहे जो हो, साहित्य, दर्शन, कला, संस्कृति, विज्ञान, सामाजिक-सरोकार अथवा राजनीति, सभी विषयों पर वे अधिकार पूर्वक मोहक व्याख्यान देने में समर्थ थे। भारत, भारती और भारतीय संस्कृति के वे महान ध्वज-वाहक थे। उनके तीनों पुत्रों प्रो शैलेंद्रनाथ श्रीवास्तव, डा रवीन्द्र राजहंस और डा वीरेंद्र नाथ और तीनों पुत्र-वधुओं डा वीणारानी श्रीवास्तव, डा आरती राजहंस तथा डा मधु वर्मा ने भी उनकी ज्ञान-परंपरा और साहित्य-सेवा की विरासत को अग्रगामी बनाया।
डा सुलभ ने सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष प्रो केसरी कुमार और व्यंग्य के सुख्यात कवि डा रवीन्द्र राजहंस को भी स्मरण किया और कहा कि केसरी जी एक महान समालोचक और राजहंस जी व्यंग्य-साहित्य को नया आयाम देने वाले कवि थे। उनकी कविता ‘कहाँ मिलता है भला आदमी?” इसके उदाहरण में प्रस्तुत किया जा सकता है।
समारोह के मुख्य अतिथि और बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक आलोक राज ने कहा कि आज स्मरण किए गए तीनों साहित्यिक विभूतियाँ लोकप्रिय प्राध्यापक, मनीषी विद्वान और अपने समय के महान कवि थे। अपनी कृतियों में वे सदैव अमर रहेंगे। मुरलीधर श्रीवास्तव जी अद्भुत वक्ता थे। उनके साहित्य और व्याख्यान से अमृत की वर्षा होती थी। उनके पुत्र पद्मश्री डॉ रवींद्र राजहंस, जो कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक थे, हिन्दी में व्यंग्य लिखा करते थे। अनेक पत्रों में उनके व्यंग्य-स्तम्भ प्रकाशित होते थे। लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन-काल में वे नुक्कड़-कवि-सम्मेलन में बहुत सक्रिए रहे। उन्होंने कहा कि यदि हमें उन्नत और अपराधमुक्त समाज बनाना है तो साहित्य का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार करना चाहिए।
आरम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने कहा कि आदरणीय शेखर जी को देख कर समझा जा सकता था कि ‘ज्ञान-परंपरा’ किसे कहते हैं। उनके साथ बैठने का अर्थ ज्ञान-परंपरा के साथ सत्संग करना था।
सम्मेलन की उपाध्यक्ष और शेखर जी की पुत्रवधू प्रो मधु वर्मा ने कहा कि शेखर जी अपने साहित्य में सदैव जीवन को मूल्य देते रहे। जीवन में प्रेम और उत्साह को उन्होंने सर्वोच्च स्थान दिया। राष्ट्रकवि दिनकर पर उन्होंने ‘युग पुरुष दिनकर’ शीर्षक से अत्यंत हृदय-स्पर्शी रचना की थी, जिसके लिए दिनकर जी उनके प्रति अत्यंत श्रद्धास्पद भाव रखते थे। आचार्य शेखर के पौत्र पारिजात सौरभ, डा रत्नेश्वर सिंह, डा पुष्पा जमुआर, विभारानी श्रीवास्तव, कमल नयन श्रीवास्तव आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए तथा तीनों साहित्यिक विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवयित्री आराधना प्रसाद, डा पूनम आनन्द, डा पूनम देवा, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, शमा कौसर ‘शमा’, मधुरानी लाल, ईं अशोक कुमार, तनुजा सिंहा, पूनम कतरियार, डा अर्चना त्रिपाठी, कुमार अनुपम, इन्दु भूषण सहाय आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रवीर कुमार पंकज ने किया।
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