‘हिन्दुस्तानी साइलेंट सिनेमा’ पुस्तक पर चर्चा : मूक सिनेमा वास्तव में मुखर सिनेमा था-डॉ. राजीव श्रीवास्तव

भारतीय सिनेमा की जड़ें उस मूक युग में निहित हैं, जिसने अभिव्यक्ति की एक अनूठी भाषा विकसित की। भारत का मूक सिनेमा न केवल तकनीकी प्रयोगों का प्रारम्भिक चरण था, बल्कि यह भारतीय समाज, संस्कृति और लोकभावनाओं का सशक्त दृश्य दस्तावेज भी रहा है। दादा साहेब फाल्के से आरम्भ हुई यह यात्रा भारतीय सिनेमा के विशाल भवन की सुदृढ़ नींव के रूप में आज भी प्रेरणा देती है। इसी समृद्ध परम्परा को केन्द्र में रखते हुए इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) का मीडिया सेंटर ने धर्मेन्द्र नाथ ओझा की पुस्तक ‘हिंदुस्तानी साइलेंट सिनेमा’ पर चर्चा का आयोजन किया।

साइलेंट हिन्दुस्तानी सिनेमा का लोकार्पण करते हुए धर्मेन्द्र ओझा, अनुराग पुनेठा, डॉ. ज्योतिष जोशी और डॉ. राजीव श्रीवास्तव
Written By : डेस्क | Updated on: March 31, 2026 11:13 pm

कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के मीडिया सेंटर के प्रमुख अनुराग पुनेठा ने की। मुख्य वक्ता थे प्रसिद्ध आलोचक, संपादक एवं लेखक डॉ. ज्योतिष जोशी। इस अवसर पर वरिष्ठ लेखक, सिने इतिहासवेत्ता एवं फिल्मकार डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने भी अपने विचार रखें। लेखक धर्मेन्द्र ओझा ने पुस्तक के बारे में विस्तार से जानकारी दी। अध्यक्षीय वक्तव्य में अनुराग पुनेठा ने कहा कि यह पुस्तक भारत में साइलेंट सिनेमा के युग पर बहुत प्रामाणिक जानकारी प्रदान करती है। यह पुस्तक सिनेमाप्रेमियों को अवश्य पढ़नी चाहिए।

मुख्य वक्ता डॉ. ज्योतिष जोशी ने कहा कि इस पुस्तक में एक नहीं, चार पुस्तकें हैं। इसमें मूक सिनेमा के दौर के विभिन्न स्टूडियो के बारे में जानकारी है, इस पर अलग से किताब बन सकती है। इसी तरह, उस दौर के कलाकारों के बारे में अलग से पुस्तक बन सकती है। इसमें विश्व में सिनेमा के विकास पर प्रामाणिक जानकारी है, उस पर अलग पुस्तक बन सकती है। सिनेमा पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं, लेकिन यह एक अलग तरह की पुस्तक है। इसकी शैली भी बहुत रोचक है। यह पुस्तक एक समाजशास्त्रीय हस्तक्षेप है। इसका स्वरूप संवादात्मक है। एक ही पुस्तक भीतर विभिन्न साहित्यिक शैलियों— विमर्शात्मक, ऐतिहासिक और राजनीतिक— का समावेश देखने के मिलता है। इसमें सिर्फ इतिहास नहीं है, इसमें उपन्यास भी है, किस्सागोई भी है। हम आज के दौर की फिल्मों को उस दौर की फिल्मों के बरक्स रखकर देखें, तो हमें पता चलेगा कि फिल्में कहां से कहां तक आ गईं।

डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि मूक सिनेमा वास्तव में मुखर सिनेमा था। उन्होंने सिनेमा की परम्परा को नाट्यशास्त्र से जोड़ते हुए कहा कि मूक सिनेमा में नाट्यशास्त्र के भावों की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। उन्होंने कहा, मूक सिनेमा की परम्परा 1934-35 में समाप्त नहीं हो गई, यह अभी भी चली आ रही है। इस संदर्भ में उन्होंने संजय लीला भंसाली की अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी अभिनीत ‘ब्लैक’ का उदाहरण देते हुए कहा कि इस फिल्म में दोनों मुख्य पात्रों के बीच संवाद शब्दों के जरिये नहीं, भावों के ज़रिये होता है। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि मूक सिनेमा ही वास्तविक सिनेमा है।

पुस्तक के लेखक धर्मेन्द्र ओझा ने बताया कि इस पुस्तक का विचार किस तरह अंकुरित हुआ। किस तरह एक फिल्म के लिए शोध करते-करते इस पुस्तक की सामग्री इकट्ठा हो गई। फिल्म तो नहीं बन सकी, लेकिन वह शोध पुस्तक के रूप में फलित हुआ। उन्होंने पुस्तक के कई दिलचस्प तथ्यों से भी अवगत कराया और रेखांकित किया कि किस तरह भारतीय सिनेमा में नृत्य, गीत-संगीत और कॉमेडी की परम्परा शुरू हुई।

कार्यक्रम में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के पूर्व निदेशक और प्रसिद्ध लेखक पंकज राग की भी गरिमामय उपस्थिति रही। इस चर्चा कार्यक्रम में सिनेमाप्रेमियों और सिनेमा के छात्रों ने उत्साहपूर्ण भागीदारी की।

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