वार्ता के दौरान अमेरिका ने ईरान (Iran) से परमाणु हथियार न बनाने की स्पष्ट गारंटी मांगी, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन पाई। वहीं अमेरिका-ईरान के बीच आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के मुद्दे पर भी गतिरोध बना रहा। सूत्रों के अनुसार, अमेरिका की ओर से दिया गया “अंतिम प्रस्ताव” भी बातचीत को आगे नहीं बढ़ा सका। इस विफलता के पीछे सबसे बड़ी वजह दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास माना जा रहा है। मिडिल ईस्ट में प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा भी एक बड़ा कारण रही।
इसी बीच, सबसे गंभीर चिंता हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz ) को लेकर बढ़ गई है। दुनिया के प्रमुख तेल मार्गों में शामिल इस क्षेत्र में तनाव के कारण आवाजाही प्रभावित हो रही है। यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
वार्ता के विफल होने के बाद क्षेत्र में फिर से संघर्ष भड़कने की आशंका भी तेज हो गई है। युद्धविराम कमजोर पड़ता दिख रहा है और हालात बिगड़ने पर बड़े सैन्य टकराव की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है। पाकिस्तान (Pakistan ) ने इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई, लेकिन समझौता न हो पाने से उसके प्रयासों को झटका लगा है। हालांकि पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से बातचीत जारी रखने और शांति बनाए रखने की अपील की है।
विश्लेषकों का मानना है कि 21 घंटे की लंबी बातचीत के बावजूद कोई ठोस नतीजा न निकलना इस बात का संकेत है कि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव अब गहरा और जटिल हो चुका है, जिसका असर आने वाले समय में पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
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