यह सीजफायर तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन इस पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। ज्यादातर खबरों में इसे “fragile ceasefire” यानी नाजुक समझौता बताया गया है। यह समझौता केवल सैन्य गतिविधियों को अस्थायी रूप से रोकता है, मूल विवादों को हल नहीं करता। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अब भी जस के तस बने हुए हैं।
युद्ध टला, खत्म नहीं
विश्लेषकों के मुताबिक, इस सीजफायर को युद्ध के अंत के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसे युद्ध के बीच का विराम कहा जा रहा है। मध्य-पूर्व में अन्य मोर्चों पर तनाव जारी है और इज़राइल से जुड़े घटनाक्रम भी स्थिति को जटिल बनाए हुए हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यह शांति ज्यादा दिन टिकेगी नहीं, अगर ठोस कूटनीतिक पहल नहीं हुई।
बाजारों में राहत की लहर
सीजफायर का सबसे तत्काल असर वैश्विक बाजारों में देखने को मिला है। तेल की कीमतों में गिरावट आई है और शेयर बाजारों में तेजी दर्ज की गई है।ब्रेट क्रूड करीब 4% गिरकर 86 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया, वहीं WTI क्रूड में भी 3.5% की गिरावट दर्ज की गई और यह 82 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। विश्लेषकों का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ में सप्लाई बाधित होने की आशंका कम होते ही बाजार ने राहत की प्रतिक्रिया दी। ऊर्जा आपूर्ति को लेकर जो डर बना हुआ था, उसमें कमी आई है। खासकर स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ से सप्लाई बाधित होने की आशंका फिलहाल टलती दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसे आयातक देशों के लिए सकारात्मक संकेत है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है, क्योंकि जरा-सी चिंगारी फिर से कीमतों को ऊपर ले जा सकती है।
जो भी हो अमेरिका के साथ भारतीय शेयर बाजारों पर इस सीजफायर का सकारात्मक असर दिखा। BSE Sensex में करीब 650 अंकों (लगभग 0.9%) की तेजी आई। Nifty 50 भी 180 अंकों (करीब 1%) तक चढ़ गया। ऊर्जा, बैंकिंग और आईटी सेक्टर के शेयरों में सबसे ज्यादा खरीदारी देखने को मिली।
कूटनीति को नया मौका
दुनिया भर के देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस सीजफायर का स्वागत किया है। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय देशों और एशियाई शक्तियों ने इसे बातचीत के लिए एक अवसर बताया है। इस समझौते के पीछे पाकिस्तान और चीन सहित कई देशों की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका रही है। इसे “डिप्लोमैटिक विंडो” यानी बातचीत की खिड़की के रूप में देखा जा रहा है, जहां स्थायी समाधान की दिशा में प्रयास हो सकते हैं।
दोनों की अपनी जीत
दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही देश इस सीजफायर को अपनी-अपनी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं। अमेरिका इसे अपने रणनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति बता रहा है, जबकि ईरान इसे अपनी कूटनीतिक सफलता के तौर पर देख रहा है। विश्व मीडिया ने इसे “नैरेटिव वॉर” यानी कथानक की लड़ाई करार दिया है, जहां असली संघर्ष के साथ-साथ छवि की लड़ाई भी चल रही है।
खतरे अब भी बरकरार
विश्लेषकों का मानना है कि इस सीजफायर के बावजूद कई बड़े खतरे अभी भी मौजूद हैं। परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद, क्षेत्रीय ताकतों के बीच टकराव और प्रॉक्सी संघर्ष जैसी समस्याएं अभी सुलझी नहीं हैं। इसी वजह से मीडिया बार-बार यह चेतावनी दे रहा है कि यह शांति बहुत नाजुक है और थोड़ी-सी चूक इसे फिर से संघर्ष में बदल सकती है।
दुनिया पर व्यापक असर
इस घटनाक्रम का असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार, महंगाई और भू-राजनीतिक समीकरण—सभी इससे प्रभावित हो रहे हैं। यदि यह सीजफायर टिकता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर यह टूटता है, तो हालात और भी गंभीर हो सकते हैं।
अगले दो हफ्ते अहम
अब दुनिया की नजरें आने वाले दो हफ्तों पर टिकी हैं। यही वह समय है जिसमें तय होगा कि यह सीजफायर स्थायी शांति की दिशा में पहला कदम बनेगा या केवल एक अस्थायी ठहराव साबित होगा। फिलहाल स्थिति यही कहती है— दुनिया ने राहत की सांस तो ली है, लेकिन सतर्कता अभी भी बरकरार है।
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