इस बीच सऊदी अरब में हूती विद्रोहियों के हमलों में 73 लोग घायल हुए हैं। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के मुताबिक अबहा, खमिस मुशैत, जिजान और नजरान में नागरिक और आर्थिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। हमलों के कारण कई ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और कुछ जगहों पर परिचालन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने इसे गंभीर घटनाक्रम बताया है।
हमलों का सबसे बड़ा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में दिखाई दिया। Brent crude करीब 98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI भी 93 डॉलर से ऊपर चला गया। बाजार में आशंका है कि अगर सऊदी अरब जैसे बड़े तेल उत्पादक देश के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले बढ़ते हैं तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का पहला असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा।
तेल महंगा होने का मतलब है कि समान मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत को अधिक डॉलर खर्च करने होंगे। इससे देश के व्यापार संतुलन और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है। पहले भी मध्य-पूर्व में आपूर्ति बाधित होने की आशंका के दौरान कच्चे तेल की तेजी के साथ रुपये पर दबाव और महंगाई की चिंता बढ़ती रही है। दूसरा असर रुपये की विनिमय दर पर पड़ सकता है। तेल आयातकों को अधिक डॉलर की जरूरत पड़ने से डॉलर की मांग बढ़ती है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक रहती है तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। रुपये के कमजोर होने से भारत के लिए तेल और अन्य आयातित वस्तुओं की लागत और बढ़ सकती है।
भारत पर हर 10 डॉलर की तेजी का असर
कच्चे तेल की कीमत में लगातार 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत के लिए बड़ा अतिरिक्त आयात बोझ पैदा कर सकती है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है। जुलाई 2026 में ही भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 18.31 अरब डॉलर रहा था। ऐसे में तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने पर आयात बिल और व्यापार घाटा बढ़ सकता है, रुपये पर दबाव पड़ सकता है और महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है। जुलाई में भारत का माल व्यापार घाटा पहले ही 31.98 अरब डॉलर के छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच चुका था, जबकि अप्रैल-जून तिमाही में चालू खाते का घाटा बढ़कर 4.2 अरब डॉलर यानी GDP का 0.5 प्रतिशत हो गया था।
तीसरा असर महंगाई पर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से माल ढुलाई महंगी हो सकती है और इसका असर खाद्य पदार्थों समेत कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। उद्योगों की उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है।
संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं
मध्य-पूर्व का संकट भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र भारत के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। SBI Mutual Fund के विश्लेषण के अनुसार मध्य-पूर्व भारत के वस्तु निर्यात का लगभग 14 प्रतिशत बाजार है। इसके अलावा क्षेत्र से भारत को ऊर्जा और उर्वरक सहित कई महत्वपूर्ण आयात मिलते हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि हूती हमले अगर सऊदी अरब से आगे लाल सागर और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों तक फैलते हैं तो तेल के साथ-साथ वैश्विक व्यापार और जहाजों की आवाजाही भी प्रभावित हो सकती है। हूती पहले ही लाल सागर और आसपास के समुद्री मार्गों में हमलों के जरिए अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए जोखिम बढ़ा चुके हैं।
सऊदी अरब ने दी जवाब की चेतावनी
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हमलों को गंभीर escalation बताया है और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। हूती पक्ष ने इन हमलों को यमन में सऊदी कार्रवाई के जवाब के तौर पर पेश किया है। ऐसे में आने वाले दिनों में संघर्ष के और फैलने की आशंका ने तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या मध्य-पूर्व का यह संघर्ष तेल की कीमत को 100 डॉलर के पार ले जाएगा और यदि ऐसा होता है तो भारत कितने समय तक इसका आर्थिक दबाव झेल पाएगा। फिलहाल तेल बाजार की तेजी भारत के लिए महंगाई, रुपये और आयात बिल—तीनों मोर्चों पर खतरे की घंटी है।
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