यूएस-ईरान युद्ध के असर को लेकर जारी भारतीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक मुंबई में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की कमी से होटल-रेस्तरां संचालकों को परेशानी हो रही है, जबकि बेंगलुरु में होटल उद्योग से जुड़े संगठनों ने चेतावनी दी है कि गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो कई प्रतिष्ठानों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ सकता है। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) ने पेट्रोलियम मंत्रालय को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि अगर कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति बाधित हुई तो देश भर में बड़ी संख्या में रेस्तरां बंद हो सकते हैं। रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग के बीच न्यूनतम अंतराल बढ़ाकर 25 दिन कर दिया है ताकि संकट के समय जमाखोरी रोकी जा सके।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिख रहा है। फारस की खाड़ी से गुजरने वाले समुद्री मार्गों पर खतरे के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की कीमत लगभग चार साल के उच्च स्तर के करीब पहुंच गई, जिसके कारण भारतीय तेल कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी गई है। इसका असर सबसे पहले उन देशों पर पड़ा है जो ऊर्जा के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं।
पाकिस्तान में सरकार ने ईंधन बचाने के लिए कई आपात कदम उठाए हैं। वहां सरकारी दफ्तरों में चार दिन का कार्य सप्ताह लागू करने और स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद रखने का फैसला किया गया है। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने के साथ कई शहरों में ईंधन की कमी की खबरें भी सामने आई हैं।
बांग्लादेश ने भी बिजली और ईंधन की बचत के लिए विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के समय में कटौती की है। श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में भी ऊर्जा आयात महंगा होने की आशंका के चलते सरकारें स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।
भारत की स्थिति फिलहाल अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करता है, लेकिन उसके पास आयात के कई स्रोत हैं। रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने की वजह से आपूर्ति पर तुरंत संकट की आशंका कम है। अमेरिकी प्रशासन ने भी वैश्विक आपूर्ति संतुलन बनाए रखने के लिए भारत द्वारा रूसी तेल खरीद जारी रखने पर आपत्ति नहीं जताई है।
हालांकि रूस ने हाल में अपने तेल के दाम बढ़ा दिए हैं। ऐसे में यदि युद्ध लंबा खिंचता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत में तेल-गैस की आपूर्ति पर भले बड़ा संकट न आए, लेकिन परिवहन, रसोई गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं के महंगे होने से आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया का यह संघर्ष जितना लंबा चलेगा, उसका आर्थिक असर उतना ही गहरा होगा। फिलहाल भारत सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर रणनीतिक तेल भंडार और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों का सहारा लेने की तैयारी कर रही है।
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