व्यावसायिक जीवन में निर्मला कर्ण जी बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के रूप में कार्य किया है. भारतीय सामान्य जनजीवन और निम्न मध्यवर्गीय परिवार की समस्याओं को बहुत निकट से देखने समझने का अवसर निर्मला जी को मिला है जीवन भर . “कथा एक मासूम की” इन्हीं अनुभवों के आधार पर लिखी गई कहानियाँ हैं जिसमें ज्यादा सच ही . निर्मला जी के कहने का अंदाज निराला है .परिस्थितियों पात्रों के बीच भी जाती हैं और फिर एक रचनात्मक दूरी भी रखती हैं.
कथाकार निर्मला अपने उद्गार ” लेखक की बात” में कहती हैं : कथा एक मासूम की मेरी तीन रचनाओं कर संकलन है, जो समाज की ज्वलंत समस्याओं पर आधारित है।……इस लघु उपन्यास के साथ दो कथाएं भी संकलित की गई हैं जिनका नाम क्रमशः सीमा और चन्द्रिका है ” … जाहिर है कथाकार निर्मला ने सारे घटना क्रम को बहुत समीप से देखा है और अपनी भाषा में पाठकों के सामने रखने की कोशिश की है. ‘कथा एक मासूम की ‘ झारखंड के सुदूर देहात के क्षेत्र में घटित एक घटना पर आधारित है. अभी भी डायन के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित,निष्काषित और हत्या भी किये जाने की बात सामने आती रहती है.असल में इस डायन प्रथा के पीछे छिपी होती है दबंगों या स्वजनों द्वारा महिला को उसके संपत्ति से बेदखल करने की कथा .आश्चर्य की बात है कि इस पूरी व्यथा कथा में उसके निकट संबंधी भी महत्वपूर्ण किरदार होते है.
दो कथाएं सीमा और चन्द्रिका भी दो स्त्री पात्रों पर केंद्रित कहानियां हैं.शताब्दियों से बेमेल विवाह और निरंतर पीड़ा झेलती युवतियों की कहानियाँ हैं ये. संग्रह की भाषा अति सरल और थोड़ी सपाट है पर फिर भी रोचकता बनाए हुए है. उपन्यास को थोड़ा विस्तार दिया जा सकता था और कहानियों का अलग संग्रह बेहतर होता . संग्रह पठनीय है. कहीं कहीं प्रूफ की अशुद्धि न रहती तो बेहतर होता.संग्रह की छपाई अच्छे कागज पर साफ साफ है.
संग्रह: कथा एक मासूम की, लेखिका: निर्मला कर्ण, पृष्ठ:111 प्रकाशक: प्रिन्सेस पब्लिशिंग, मूल्य: रु150.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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