पढ़ें, प्रेमरंजन अनिमेष का नवीनतम कविता संग्रह “ऊँट”

"ऊँट" हिंदी के सुपरिचित, पुरस्कृत कवि लेखक प्रेमरंजन अनिमेष का नवीनतम कविता संग्रह है. भारतवर्ष ही नहीं, पूरी दुनिया में पशु-पक्षियों के माध्यम से अपनी बात कहने की एक लंबी परंपरा रही है । विष्णु शर्मा की प्रसिद्ध कथाओं को ही देखिये । उन्होंने राजकुमारों को शिक्षित करने के लिए पशु-पक्षियों की कहानियों का सहारा लिया । इस पर काफी शोध हुआ है कि भारत से ये कथाएँ व्यापारियों के माध्यम से मध्य-पूर्व तक पहुँचीं और वहाँ से पश्चिमी देशों तक गयीं । बाद में जो विश्वप्रसिद्ध कथायें विकसित हुईं, उनके मूल स्रोतों में भारतीय कथा-परंपरा का गहरा प्रभाव रहा है ।

Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: May 20, 2026 11:06 pm

असल में, पशु-पक्षियों के माध्यम से अपनी बात कहना भारतीय साहित्यिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है। खास बात यह है कि हर क्षेत्र का जीवन अपने परिवेश के जीव-जंतुओं से गहराई से जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए, यदि अरब या मध्य-पूर्व की कहानियाँ पढ़ेंगे तो उनमें ऊँट बार-बार दिखायी देता है, क्योंकि वहाँ की संस्कृति, जीवन-शैली और परिस्थितियों में ऊँट अभिन्न हिस्सा है।

हालाँकि हिंदी प्रदेशों में ऊँट बहुत अधिक दिखायी नहीं देता, फिर भी प्रेमरंजन ने अपनी बात कहने के लिए ऊँट को चुना। यह चयन अनायास नहीं है अत्यंत सार्थक और महत्वपूर्ण है । भारत में मुख्यतः राजस्थान और गुजरात के क्षेत्रों में ऊँट जीवन का हिस्सा है। वहाँ की लोककथाओं, गीतों और जीवन में ऊँट गहराई से मौजूद है।

‘ऊँट’ का यह विलक्षण मानवीकरण अपने आप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और आश्चर्यजनक है। पूरी पुस्तक में एक प्रकार की महाकाव्यात्मक शैली है। अब प्रश्न उठ सकता है कि इसे महाकाव्यात्मक क्यों कहा जाये ? वह इसलिए कि इसमें एक जीव के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक की संपूर्ण व्यथा-कथा, उसकी भावनायें, उसकी जीवन-यात्रा और उसके अनुभवों का विस्तृत चित्रण है। चाहे वह गद्य में हो या पद्य में, महाकाव्यात्मकता का मूल तत्व यही होता है ।
यहाँ ऊँट के शिशु-जन्म से लेकर उसकी पूरी जीवन-यात्रा तक के भावों को अत्यंत सुंदर और सहज ढंग से व्यक्त किया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सहजता बहुत स्वाभाविक लगती है । ऐसा नहीं लगता कि कवि ने विशेष प्रयास करके भाव आरोपित कियै हैं । यही इस कृति की सबसे बड़ी ताकत है।

पूरी पुस्तक में 105 कवितायें हैं और लगभग 188 पृष्ठों में यह संपूर्ण रचना फैली हुई है। हिंदी साहित्य में पशु-पक्षियों पर लिखी गई चर्चित रचनाओं की बात करें तो महादेवी वर्मा की ‘गिल्लू’, ‘नीलकंठ’, ‘गौरा’ जैसी रचनाएँ याद आती हैं । नागार्जुन की ‘मादा सूअर’ पर लिखी कविता भी तत्कालीन समाज की पीड़ा को पशु के माध्यम से व्यक्त करती है। लेकिन किसी एक पशु को केंद्र में रखकर पूरी पुस्तक लिखना अत्यंत विरल कार्य है।

यह भी लगता है कि संभवतः हिंदी में यह अपने प्रकार की पहली पुस्तक होगी। अनिमेष ने जिस तरह ऊँट को प्रतीक बनाकर उसकी संपूर्ण दुनिया रची है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है  कवि ने ऊँट से जुड़े क्षेत्रीय व्यवहारों या स्थानीय भाषिक विशेषताओं का अत्यधिक सहारा नहीं लिया, और यही बात इस कविता पुस्तक को अधिक सार्वभौमिक बनाती है । यदि इसमें अत्यधिक राजस्थानी रंगत या स्थानीयता होती तो संभवतः उसकी व्यापक ग्रहणशीलता कम हो जाती । यहाँ ऊँट केवल एक जीव नहीं, बल्कि एक वृहत्तर प्रतीक बन जाता है, जो प्रकृति, संवेदना और मनुष्यता से भी उतनी ही निकटता और गहराई से जुड़ा हुआ है ।

अनिमेष ने ऊँट की गतिविधियों और उसके स्वभाव से जुड़े अनेक पक्षों को बहुत सूक्ष्मता और रोचकता से शामिल किया है । कहीं भी यह बोझिल नहीं लगता । कवितायें छोटी-बड़ी दोनों प्रकार की हैं। अपनी भूमिका में स्वयं स्वीकार भी किया है कि कवितायें आकार से अधिक प्रभाव में बड़ी हैं । लगता है कि भविष्य में इस विषय पर और भी विस्तार संभव है । कवि अनिमेष के द्वारा ऊँट पर दूसरी श्रृंखला भी लिखी जा सकती है, क्योंकि यह विषय अभी समाप्त नहीं हुआ है ।

एक और विशेष बात जो पाठक महसूस करता है, वह यह कि अनिमेष की पूर्ववर्ती रचनाओं में माँ, स्त्री और पारिवारिक संवेदनायें बार-बार मुखर होती रही हैं । कभी-कभी लगता है कि रचनात्मकता का एक बड़ा केंद्र वही है । लेकिन आश्चर्य यह है कि ऊँट पर लिखी गयी इन कविताओं में भी वही संवेदनात्मक अंतर्धारा मौजूद है । वह प्रत्यक्ष नहीं, पर अत्यंत सुंदर और काव्यात्मक ढंग से भीतर बहती रहती है। यही प्रेम रंजन अनिमेष की कविता की विशिष्टता है।

इस संग्रह में ऊँट को लेकर अनेक आयाम सामने आते हैं। उदाहरण के लिए यदि कविताओं के शीर्षक भी देखें तो ऊँट वहाँ भी पूरी सप्राणता और जीवंतता के साथ उपस्थित है कई कविताओं में — ‘कैमरे के आगे ऊँट’, ‘जब पहली बार ऊँट शहर.में आया’, ‘ऊँट-दौड़’, ‘ऊँट होना’, ‘ऊँट-विवाह’, ‘ऊँटवान’, ‘ऊँट की मुस्कान’, ‘ऊँटपन’ आदि। इन शीर्षकों के माध्यम से भी ऊँट के अनेक रूपों और स्थितियों को समेटने का प्रयास किया गया है । इसके लिए प्रेम रंजन अनिमेष सचमुच बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं।

भाषा हमेशा की तरह अत्यंत सुंदर और सहज है । पढ़ते समय लगता है कि ये कवितायें बच्चों तक भी बहुत आसानी से पहुँच सकती हैं । यदि इनमें से लगभग 25 कविताओं को चुनकर ऊँट के स्केचों के साथ बच्चों की पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाये, तो वह अत्यंत लोकप्रिय हो सकती है । बच्चे इन्हें याद करेंगे, इनसे जुड़ेंगे और ऊँट के बारे में एक नयी संवेदनात्मक समझ विकसित करेंगे।

किसी भी भाषा के विकास के लिए सबसे आवश्यक है कि आने वाली पीढ़ी उससे जुड़ सके। बड़े-बड़े सेमिनारों और फाइव-स्टार होटलों की चर्चाओं से अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि बच्चे इन कविताओं को पढ़ें और सुनें । यदि यह पुस्तक स्कूलों तक पहुँचे, प्रतियोगिताओं में बच्चे इसकी कवितायें सुनायें, तो उसका वास्तविक अर्थपूर्ण प्रभाव होगा। बच्चों को इससे एक नयी दुनिया मिलेगी।

सबसे बड़ी बात यह है कि प्रेम रंजन अनिमेष की कविताये सरल हैं, लेकिन सतही कतई नहीं । बड़े-बड़े विद्वानों की भाषा अक्सर कठिन हो जाती है, जबकि अनिमेष की कविता सहज होकर भी गहरी बात कहती है । यही उनकी रचनात्मक शक्ति है।

कृति: ऊँट (कविता संग्रह)। कवि: प्रेम रंजन अनिमेष। पृष्ठ:188

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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