पुष्पा जी की अबतक प्रकाशित कृतियों में “अनकही कथाएं”(एकल संग्रह),”रघुनाथ गाथा”(दोहा संग्रह). इसके अतिरिक्त इनकी दर्जनों रचनाएं साझा संग्रहों में शामिल हैं. पुष्पा जी इन दिनों लगातार अपनी कथा और कविता की पुस्तकें प्रकाशित कर हिंदी जगत को समृद्ध कर रही हैं. इनकी विशेषता है कि इनके सभी पुस्तकों में अलग-अलग विधा की भाषा, शैली, शब्द विन्यास और शब्द चयन बिल्कुल अलग-अलग होते हैं. कभी-कभी तो विश्वास ही नहीं होता कि सब एक ही लेखिका के द्वारा लिखा गया है!
संग्रह के प्रारंभ में पुष्पा पाण्डेय ने एक “प्राक्कथ्य ” भी लिखा है. इसमें पुष्पा जी कहती हैं: ‘ काव्य लेखन में दोहा छंद मुझे काफी प्रभावित करता है। कविवर कबीर, रहीम आदि लेखकों के दोहे तो बचपन से सुनती – पढ़ती आ रही थी, लेकिन कभी सोचा न था कि एक दिन स्वयं दोहा छंद की रचना कर डालूंगी। यह परमात्मा और माँ भारती की कृपा ही है।’
संग्रह में सम्मिलित दोहों के कुछ शीर्षक देखिए: गणेश स्तुति, सरस्वती वंदना, माता का आगमन, माता के नौ रूप, शिव विवाह, राम जन्म, कविवर सूरदास, साक्षरता, सत्य, तितली, माँ , गर्मी, बट सावित्री, चंचल मन, जानकी नवमी, बाल हनुमान, काशी, प्रेम, गुरु महिमा, रक्षाबंधन, गुलमोहर, रात, वैष्णव की स्थिति, नशा, पृथ्वी दिवस, पिता, जल, गौरैया, प्रतीक्षा, पहचान, सरहुल इत्यादि. कुछ दोहों को देखिए : “गूढ़ प्राकृतिक पर्व है, सरहुल का त्यौहार। चैत्र शुक्ल की त्रय दिवस, होता है हर बार।। ………….. भू पर जीवन दे सदा, यह जंगल अरु नीर। प्रकृति पूज्य तो है यहाँ, सबका करे जमीर।। ( -सरहुल)
इस संग्रह में तिरसठ कविताओं का समावेश किया गया है .जीवन के हरेक पहलू को छूने की कोशिश है। इन कविताओं में हालांकि हिन्दू देवी- देवताओं को लेकर अधिक कविताएं हैं. “सरस्वती वंदना ” कविता तो लंबी कविता है कई पृष्ठों की. अधिकांश कविताएं छोटी- छोटी हैं!कविताएं दोहा शैली में बहुत सरल और आकर्षक ढंग से लिखी गई हैं. कविताओं में एक प्रवाह है, कभी भी उबाऊ नहीं लगेगा. भाषा प्रांजल है पुष्पा जी की. पुस्तक के प्रारंभ में कविताओं के नाम के साथ एक विषय सूची होती तो बेहतर होता! लंबी कविताएं और भी होतीं तो संग्रह और भी आकर्षक हो जाता! पुस्तक का कागज और छपाई अच्छी है. संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है.
संग्रह का नाम: बिखरे मोती (कविता संग्रह), कवयित्री : पुष्पा पाण्डेय, पृष्ठ:120, प्रकाशक: बोधि जन संस्करण, मूल्य:रु.150.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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